मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026

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पालघर के सफाले में छह गांवों का विरोध, उद्योगमंत्री सामंत का पुतला जलाया

सफाले के छह गांवों के लोगों ने प्रस्तावित एमआईडीसी और एस्सार परियोजना के खिलाफ उसरणी नाका पर प्रदर्शन किया और उद्योगमंत्री उदय सामंत का पुतला जलाया।

पालघर के सफाले में छह गांवों का विरोध, उद्योगमंत्री सामंत का पुतला जलाया तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

पालघर जिले के सफाले में पश्चिमी किनारे पर बसे छह गांवों के लोग प्रस्तावित एमआईडीसी और एस्सार परियोजना के खिलाफ खुलकर सड़क पर उतर आए हैं। उनका साफ कहना है कि विकास के नाम पर उनकी जमीनें छीनने की कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। गांव वालों ने तीखे लफ्जों में कहा, "हमें गोली मार दो तो चलेगा, लेकिन हमारी जमीन पर यह परियोजना खड़ी नहीं होने देंगे।"

उसरणी नाका पर बड़ी तादाद में ग्रामीण इकट्ठा हुए और सरकार की भूमि अधिग्रहण नीति के खिलाफ जोरदार नारेबाजी करके पूरा इलाका गुंजा दिया। उद्योगमंत्री उदय सामंत के बयान के विरोध में उनके पुतले को डंडों से पीटा गया और फिर पुलिस के सामने ही उसे जला दिया गया। इस दौरान आंदोलन करने वालों और पुलिस के बीच धक्का-मुक्की भी हुई।

ग्रामीण कई दिनों से इन परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। लेकिन भूमि अधिग्रहण को लेकर उद्योगमंत्री उदय सामंत ने जो बयान दिया, उसके बाद लोगों की नाराजगी आंदोलन की शक्ल में फूट पड़ी। प्रदर्शन में "हमारा इलाका, हमारा हक" और "विनाशकारी परियोजना नहीं चाहिए" जैसे नारे लगाकर लोगों ने अपना इरादा जता दिया।

गांव वालों ने सरकार के रुख पर सवाल उठाते हुए पूछा, "कुदरत ने हमें रोजी-रोटी के साधन दिए हैं, फिर विकास के नाम पर हमारी जमीनें छीनने की जिद किसलिए?" आंदोलन करने वालों का यह भी सवाल था कि जिन परिवारों का गुजारा खेती पर टिका है, उनकी जमीनें चली गईं तो वे अपना पेट कैसे पालेंगे।

परियोजना की जद में आने वाले गांव पालघर तहसील के मथाने, भादवे, उसरणी, दांडा, खटाळी और मधुकरनगर हैं। इन छह गांवों की करीब 1 हजार 250 हेक्टेयर जमीन के संभावित अधिग्रहण को लेकर लोगों में गहरी नाराजगी है। बताया जा रहा है कि इसमें करीब 890 हेक्टेयर निजी मालिकाना हक की जमीन है, जबकि 215 हेक्टेयर सरकारी जमीन है।

इस संभावित अधिग्रहण से किसानों, स्थानीय निवासियों और आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का सवाल सामने आ खड़ा हुआ है। इस इलाके के कई परिवारों की रोजी का मुख्य सहारा खेती ही है। ऐसे में अगर प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए जमीनें ली गईं, तो खेती, पानी के स्रोतों और कुदरती संसाधनों पर गंभीर असर पड़ने का डर ग्रामीणों ने जताया है।

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