शनिवार, 7 नवंबर 2026

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ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सिर्फ माता-पिता की तनख्वाह एकमात्र आधार नहीं

ओबीसी क्रीमी लेयर: सुप्रीम कोर्ट ने कहा, सिर्फ माता-पिता की तनख्वाह एकमात्र आधार नहीं तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ओबीसी क्रीमी लेयर तय करने का अकेला आधार माता-पिता की तनख्वाह नहीं हो सकती। केंद्र की दो साल की मोहलत की मांग भी खारिज कर दी गई।

सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर तय करने के तरीके पर अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने साफ किया कि किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखा जाए या नहीं, यह तय करने के लिए सिर्फ माता-पिता की तनख्वाह को एकमात्र आधार नहीं बनाया जा सकता। केंद्र सरकार ने यह फैसला लागू करने के लिए दो साल की मोहलत मांगी थी, लेकिन उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

इस विवाद की जड़ 8 सितंबर 1993 को जारी एक कार्यालय आदेश (ऑफिस मेमोरेंडम) में है। उस आदेश में ओबीसी वर्ग के लिए क्रीमी लेयर की सीमा तय की गई थी। मूल नियमों के मुताबिक माता-पिता की तनख्वाह और खेती की आमदनी को संपत्ति और आय की गिनती से बाहर रखा गया था, ताकि पिछड़ेपन का सही और व्यावहारिक पैमाना लगाया जा सके।

फिर 14 अक्टूबर 2004 को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (DoPT) ने एक स्पष्टीकरण पत्र जारी किया। इसमें निर्देश दिया गया कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSU), राष्ट्रीयकृत बैंकों और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की तनख्वाह को भी क्रीमी लेयर की आय में जोड़ा जाए।

इससे एक बड़ा विरोधाभास पैदा हो गया। समान श्रेणी या समान दर्जे के पदों पर सरकारी सेवा में काम करने वाले कर्मचारियों के बच्चों के मामले में तनख्वाह गिनी नहीं जाती थी, जबकि निजी कंपनियों और सार्वजनिक उपक्रमों के कर्मचारियों की तनख्वाह जोड़ी जाती थी। नतीजा यह हुआ कि निजी और सार्वजनिक उपक्रमों से आने वाले कर्मचारियों के बच्चों को ओबीसी आरक्षण का फायदा मिलने में बड़ी दिक्कतें आने लगीं, जबकि सरकारी कर्मचारियों के बच्चों को यह फायदा आसानी से मिलता रहा।

सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने इस व्यवस्था को साफ तौर पर "भेदभावपूर्ण" कहा। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पदों की सही बराबरी तय किए बिना इस तरह फर्क करना कानून की नजर में पूरी तरह गलत है।

न्यायमूर्ति पी. एस. नरसिम्हा और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने केंद्र सरकार की याचिका खारिज करते हुए कई बातें रखीं। पीठ के मुताबिक सिर्फ माता-पिता की तनख्वाह देखकर यह तय करना गलत है कि उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आता है या नहीं। इसके लिए परिवार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति, माता-पिता का पद और दूसरी व्यावहारिक बातें जांचना बेहद जरूरी है।

केंद्र सरकार ने इस फैसले को लागू करने के लिए दो साल का अतिरिक्त वक्त मांगा था। सरकार का कहना था कि सभी संबंधित पक्षों से बात करके नई एक जैसी नीति बनाने के लिए समय चाहिए। कोर्ट ने यह दलील नहीं मानी और कहा कि फैसले को लागू करने में देरी की कोई ठोस वजह नहीं है।

कोर्ट ने यह भी साफ किया कि 11 मार्च 2026 को दिए गए इस फैसले का फायदा पुराने मामलों में पिछली तारीख से नहीं मिलेगा। यानी पुरानी नियुक्तियां, चयन प्रक्रियाएं या किसी की सीनियरिटी इससे प्रभावित नहीं होगी, और पुराने मामले दोबारा नहीं खोले जाएंगे।

इस फैसले का सबसे तुरंत असर आने वाली या चल रही परीक्षाओं पर पड़ेगा। सिविल सर्विसेज परीक्षा 2025 का नतीजा 6 मार्च को आ चुका है, लेकिन अलग-अलग सेवाओं का आवंटन अभी फाइनल नहीं हुआ है। कोर्ट के मुताबिक यह चयन प्रक्रिया अभी लंबित है, इसलिए 11 मार्च के फैसले में तय क्रीमी लेयर के नए सिद्धांत ही इस परीक्षा के ओबीसी उम्मीदवारों के सेवा आवंटन पर लागू होंगे।

सुप्रीम कोर्ट में अपनी बात रखते हुए केंद्र सरकार ने जोर दिया था कि अगर यह फैसला तुरंत और पिछली तारीख से लागू किया गया, तो पूरे देश की प्रशासनिक व्यवस्था पर बुरा असर पड़ेगा। सरकार की ओर से कहा गया कि 2012 से अब तक किया गया सेवा आवंटन और कैडर आवंटन इससे खतरे में पड़ सकता है। रेलवे, बैंक, डाक विभाग और अर्धसैनिक बलों जैसे बड़े संस्थानों में लाखों कर्मचारियों की सीनियरिटी सूची बदलनी पड़ सकती है। उच्च शिक्षा संस्थानों में दाखिले और चल रही भर्तियां भी बड़े पैमाने पर प्रभावित हो सकती हैं। सरकारी वकीलों ने यह भी कहा था कि नई नीति बनाने और पदों की बराबरी तय करने के लिए प्रशासन को पूरा वक्त मिलना चाहिए।

दूसरी तरफ, योग्य ओबीसी उम्मीदवारों की ओर से पेश वरिष्ठ वकील पी. विल्सन ने केंद्र के इस रुख का कड़ा विरोध किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ वक्त गुजार रही है और सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले को बेअसर करने की कोशिश कर रही है। विल्सन ने यह भी दलील दी कि गलत क्रीमी लेयर वर्गीकरण की वजह से जिन योग्य ओबीसी-एनसीएल उम्मीदवारों को नियुक्ति से वंचित रखा गया, उनके लिए सरकार अतिरिक्त पद (सुपरन्यूमररी पोस्ट) बनाए। कोर्ट ने अपने मूल आदेश में भी प्रशासन को ऐसे योग्य उम्मीदवारों को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त पद बनाने का निर्देश दिया था।

पीठ ने अपने आदेश में यह भी कहा कि 11 मार्च के फैसले के बाद रोस्टर पॉइंट के हिसाब से होने वाली सभी नियुक्तियां और आरक्षण का अमल कोर्ट की नई व्याख्या के मुताबिक ही होगा। साथ ही कोर्ट का यह फैसला सरकार को अपने नियम बनाने से नहीं रोकता। कोर्ट के स्पष्टीकरण के मुताबिक केंद्र सरकार संविधान के दायरे में रहकर और सुप्रीम कोर्ट के तय किए सिद्धांतों का पालन करते हुए अपनी नई आरक्षण और क्रीमी लेयर नीतियां बनाने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।

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