नेतान्याहू के समर्थन में उतरे ट्रम्प, पहले चार देशों में से तीन में जीता उनका उम्मीदवार
अमेरिकी राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प ने 27 अक्टूबर के इस्त्रायली संसदीय चुनाव से पहले बेंजामिन नेतान्याहू के लिए वोट मांगे हैं। इससे पहले चार देशों में उनके दखल का नतीजा तीन जीत और एक हार रहा।
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अमेरिका के राष्ट्राध्यक्ष डोनाल्ड ट्रम्प अब खुलकर दूसरे देशों के चुनावों में उतर रहे हैं। अपने पसंदीदा नेताओं और रूढ़िवादी विचारधारा वाली पार्टियों को जिताने के लिए वे सोशल मीडिया, राजनीतिक बयानों और आर्थिक धमकियों का खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। ताजा मामला इस्त्रायल का है। वहां 27 अक्टूबर को संसदीय चुनाव होना है और ट्रम्प ने वोटरों से अपील की है कि वे प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतान्याहू के साथ खड़े रहें।
इससे पहले ट्रम्प दुनिया के चार अहम देशों के चुनावों में इसी तरह दखल दे चुके हैं। इनमें से तीन जगह उनके समर्थन वाले उम्मीदवार जीते, जबकि एक जगह उन्हें हार का सामना करना पड़ा। ट्रम्प की इस नीति से वैश्विक राजनीति और कूटनीति में हलचल मची हुई है। दूसरे देशों की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और जनता की राय को प्रभावित करने की उनकी कोशिश कितनी कामयाब रही, यह समझने के लिए पिछले नतीजों पर नजर डालना जरूरी है।
सबसे पहले होंडुरास की बात। नवंबर 2025 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने पहली बार अपना राजनीतिक वजन लगाया। उन्होंने रूढ़िवादी उम्मीदवार नसरी अस्फुरा को सीधा समर्थन दिया। ट्रम्प ने साफ चेतावनी भी दी कि अस्फुरा हारे तो अमेरिका होंडुरास को मिलने वाली सारी आर्थिक मदद रोक देगा। उन्होंने विरोधी उम्मीदवार साल्वाडोर नसरल्ला की भी तीखी आलोचना की। 24 दिसंबर 2025 को आए आखिरी नतीजे में अस्फुरा को 40.27% वोट मिले और नसरल्ला को 39.53%। यानी ट्रम्प का उम्मीदवार जीता, लेकिन बहुत मामूली अंतर से।
जापान में फरवरी 2026 के आम चुनाव से पहले ट्रम्प ने प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और उनके सत्ताधारी गठबंधन को पूरा समर्थन देने का ऐलान किया। उन्होंने ताकाइची को मजबूत और लोकप्रिय नेता बताया और कहा कि यह चुनाव जापान की सुरक्षा और भविष्य के लिए बेहद अहम है। 8 फरवरी 2026 को हुए इस चुनाव में ताकाइची के गठबंधन को ऐतिहासिक और भारी बहुमत मिला। यहां ट्रम्प का समर्थन ताकाइची की राजनीतिक छवि को और मजबूत करने वाला साबित हुआ।
कई देशों में कामयाबी के बाद अप्रैल 2026 में हंगरी के चुनाव में ट्रम्प की रणनीति को बड़ा झटका लगा। उन्होंने दक्षिणपंथी प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान का साथ दिया था। उनके उपराष्ट्रपति जे.डी. व्हान्स तो खुद बुडापेस्ट गए और ऑर्बान के पक्ष में सार्वजनिक भाषण दिए। फिर भी हंगरी के वोटरों ने स्थानीय मुद्दों, आर्थिक मंदी, भ्रष्टाचार और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश के अकेले पड़ जाने के सवाल पर वोट दिया। पीटर मैग्यार की अगुवाई वाली टिस्झा पार्टी को साफ बहुमत मिला और ऑर्बान की सत्ता चली गई। इस नतीजे ने दिखाया कि किसी विदेशी नेता का समर्थन स्थानीय नाराजगी के आगे कम पड़ सकता है।
चौथा मामला कोलंबिया का है। जून 2026 के राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प ने अबेलार्डो दे ला एस्प्रीएला को समर्थन दिया। उन्होंने कहा कि कोलंबिया और अमेरिका के रिश्तों के भविष्य के लिए यह नतीजा अहम है। शुरुआती मतगणना में दे ला एस्प्रीएला को 49.66% वोट मिले और वे जीत गए। कोलंबिया के निवर्तमान राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने इस दखल की कड़ी निंदा की। पेट्रो का आरोप है कि एक देश का दूसरे देश के चुनाव में ऐसे दखल देना लोकतंत्र और आजादी पर सीधा हमला है।