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13:21 IST

नवरात्र में अर्धनारीश्वर रूप का स्मरण: शिव और पार्वती की एकात्मता का अर्थ

नवरात्र में शक्ति की उपासना के साथ भगवान शिव और माता पार्वती के अर्धनारीश्वर रूप का स्मरण भी अर्थपूर्ण माना गया है।

नवरात्र में अर्धनारीश्वर रूप का स्मरण: शिव और पार्वती की एकात्मता का अर्थ तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

हिंदू धर्मपरंपरा में नवरात्र आदिशक्ति की उपासना, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का अहम उत्सव है। इन नौ दिनों में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती देवियों के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है। शक्ति की उपासना के बीच भगवान शिव और माता पार्वती की एकात्मता के प्रतीक अर्धनारीश्वर रूप का स्मरण भी खास मायने रखता है।

अर्धनारीश्वर सिर्फ शिव और शक्ति की एकरूपता दिखाने वाला दैवी स्वरूप नहीं है। यह एक बड़ा तत्त्वज्ञान भी है, जो सृष्टि में स्त्री और पुरुष तत्त्वों के एक-दूसरे के पूरक होने का एहसास कराता है।

अर्धनारीश्वर भगवान शिव और माता पार्वती के एकात्म रूप का नाम है। आम तौर पर इस रूप में मूर्ति का दायां हिस्सा भगवान शिव का और बायां हिस्सा माता पार्वती का दिखाया जाता है। शिव वाले हिस्से में जटा, त्रिशूल, रुद्राक्ष और पुरुष स्वरूप की खूबियां दिखती हैं। पार्वती वाले हिस्से में स्त्री सौंदर्य, अलंकार और शक्ति स्वरूप की खूबियां दर्शाई जाती हैं।

इस रूप से एक गहरी बात सामने आती है। शिव और शक्ति दो अलग-अलग, एक-दूसरे से बिल्कुल जुदा तत्त्व नहीं हैं। सृष्टि के अस्तित्व के लिए दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। शैव तत्त्वज्ञान में शिव को चैतन्य का और शक्ति को क्रियाशील ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है। शिव यानी अस्तित्व का बोध, और शक्ति यानी उस अस्तित्व को चलाने वाली ऊर्जा। दोनों की एकात्मता से सृष्टि की निर्मिति, स्थिति और परिवर्तन का तत्त्व समझा जा सकता है।

नवरात्र देवी की शक्ति की आराधना का उत्सव है। इसमें शक्ति के अलग-अलग रूपों की उपासना करते हुए शिव के साथ उसका अटूट नाता समझना भी जरूरी है। अर्धनारीश्वर रूप बताता है कि शक्ति के बिना शिव का कार्य प्रकट नहीं होता और शिवतत्त्व के बिना शक्ति का अस्तित्व समझा नहीं जा सकता। दोनों का रिश्ता बड़े-छोटे का नहीं, बल्कि एकात्मता और परस्पर पूरकता का है।

नवरात्र के नौ दिनों में भक्त देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा करता है। इस उपासना का आध्यात्मिक अर्थ सिर्फ बाहरी पूजा-विधि तक सीमित नहीं है। अपने भीतर के सद्गुण बढ़ाना, मन के विकारों पर जीत हासिल करना और जीवन में विवेक, करुणा, धैर्य और संतुलन लाना भी इस साधना का अहम हिस्सा है।

नवरात्र के नौवें दिन महानवमी को माता सिद्धिदात्री की पूजा होती है। नवदुर्गाओं में यह नौवां रूप है और देवी को सिद्धि देने वाली शक्ति माना जाता है। कुछ पौराणिक कथाओं के मुताबिक माता सिद्धिदात्री की कृपा से भगवान शिव को अलग-अलग सिद्धियां मिलीं और उनके शरीर का आधा हिस्सा देवी के स्वरूप में प्रकट हुआ। इसी से शिव का अर्धनारीश्वर रूप प्रसिद्ध हुआ, ऐसी कथा सुनाई जाती है। इस कथा का मूल भाव शिव और शक्ति की अविभाज्य एकात्मता है। संदेश यह है कि देवी सिर्फ शिव की सहचारिणी नहीं, बल्कि सृष्टि के कार्य को गति देने वाली आदिशक्ति हैं।

हालांकि अर्धनारीश्वर स्वरूप का संबंध सिर्फ महानवमी तक सीमित नहीं है। यह रूप शिवशक्ति की एकात्मता का शाश्वत प्रतीक है। नवरात्र के दौरान इसका स्मरण करने से देवी की उपासना के पीछे का व्यापक आध्यात्मिक तत्त्व समझने में मदद मिलती है।

अर्धनारीश्वर की सबसे अहम खासियत स्त्री और पुरुष तत्त्वों को बराबर प्रतिष्ठा मिलना है। भारतीय तत्त्वज्ञान में सृष्टि के अलग-अलग पहलुओं को पुरुष और प्रकृति, चैतन्य और ऊर्जा, स्थिरता और क्रियाशीलता जैसी धारणाओं से समझाया गया है। इनका अर्थ सिर्फ जैविक स्त्री-पुरुष भेद तक सीमित नहीं है। ये विश्व के अस्तित्व के अलग-अलग पहलुओं का प्रतीकात्मक दर्शन कराती हैं। अर्धनारीश्वर रूप में दोनों तत्त्वों को एक ही दैवी स्वरूप में जगह दी गई है, यानी स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के प्रतिस्पर्धी नहीं, पूरक हैं।

शिव और शक्ति को एक ही रूप में क्यों दिखाया गया, इसका जवाब शिवशक्ति के अद्वैत की धारणा में मिलता है। अद्वैत यानी बुनियादी स्तर पर भेद से परे एकात्मता। भगवान शिव को चैतन्य का प्रतीक और माता पार्वती को उस चैतन्य को अभिव्यक्त करने वाली शक्ति माना जाता है। शक्ति से ही सृष्टि में हलचल, परिवर्तन और निर्मिति होती है।

नवरात्र में अर्धनारीश्वर के स्मरण के लिए कोई खास विधि हर जगह जरूरी है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। स्थानीय परंपरा, कुलाचार और संप्रदाय के मुताबिक उपासना के तरीके बदल सकते हैं। भक्त घर या मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती की संयुक्त पूजा कर सकते हैं। शिव-पार्वती की प्रतिमा के सामने दीप जलाकर प्रार्थना करना, शिवशक्ति की एकात्मता पर चिंतन करना और परिवार में प्रेम, आपसी सम्मान और सामंजस्य बना रहे, यह प्रार्थना करना इस उपासना का भाव हो सकता है। किसी खास विधि से ज्यादा श्रद्धा, शुद्ध भाव और तत्त्वज्ञान को समझने की इच्छा अहम है।

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