नवरात्र की अष्टमी-नवमी पर होम में नारियल क्यों चढ़ाया जाता है, जानिए परंपरा का मतलब
नवरात्र की महाअष्टमी और महानवमी पर होम-हवन में नारियल अर्पित करने की परंपरा और उसके पीछे बताए जाने वाले अर्थ।
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नवरात्रोत्सव में आदिशक्ति की उपासना की जाती है। नौ दिनों तक देवी के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना, मंत्रजप, उपवास, सप्तशती का पठन और कई धार्मिक विधियां की जाती हैं। नवरात्रि की महाअष्टमी या महानवमी पर कई घरों और मंदिरों में हवन या होम होता है।
इस होम में नारियल अर्पित करने की परंपरा खास मानी जाती है। होम के आखिर में जो अंतिम आहुति दी जाती है, उसे पूर्णाहुति कहते हैं। कई जगह इस पूर्णाहुति में नारियल, घी और हवनसामग्री चढ़ाई जाती है।
सवाल यह है कि देवी के होम में नारियल ही क्यों चढ़ाया जाता है और इस परंपरा के पीछे कौन सा आध्यात्मिक अर्थ छिपा है। नारियल चढ़ाना सिर्फ धार्मिक विधि है या इसके पीछे कोई प्रतीकात्मक संदेश भी है। इन सवालों के जवाब भारतीय धार्मिक परंपरा, श्रद्धा और उपासना के तत्त्वज्ञान में मिलते हैं।
हिंदू धर्म में नारियल को बहुत पवित्र स्थान मिला है। किसी भी शुभ काम की शुरुआत में, देवपूजा में, कलशस्थापना में और यज्ञ-याग में नारियल का इस्तेमाल होता है। नारियल को श्रीफल भी कहा जाता है।
नारियल की बनावट से इंसानी जिंदगी का प्रतीकात्मक अर्थ बताया जाता है। ऊपर का रेशेदार आवरण, सख्त खोल और भीतर की सफेद गिरी, इनकी तुलना क्रम से बाहरी व्यक्तित्व, अहंकार के आवरण और अंतःकरण की शुद्धता से की जाती है। यह धार्मिक प्रतीकात्मक अर्थ है। नारियल को अग्नि में अर्पित करने का मतलब है अपने अहंकार को छोड़कर शुद्ध मन से देवी की शरण में जाने की भावना।
शक्ति उपासना की कुछ परंपराओं में पहले से पशुबलि की प्रथा मिलती है। खासकर कुछ शक्तिपीठों और क्षेत्रीय धार्मिक परंपराओं में अष्टमी या नवमी के दिन बलिविधि की जाती थी। हालांकि सभी देवीमंदिरों या सभी शक्तिपूजा परंपराओं में यह प्रथा नहीं थी।
समय के साथ कई जगह अहिंसक और सात्त्विक पूजापद्धतियों को अहमियत मिली। ऐसी परंपराओं में नारियल चढ़ाना बलि के प्रतीकात्मक विकल्पों में से एक माना जाता है। नारियल फोड़कर या देवी को अर्पित करके भक्त अपने मन की बुरी प्रवृत्तियों को छोड़ने का संकल्प करता है। यहां बलि का आध्यात्मिक अर्थ अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, मत्सर और आसक्ति जैसे दोषों पर जीत पाना बताया जाता है।
फिर भी यह पक्के तौर पर नहीं कहा जा सकता कि नारियल चढ़ाने की प्रथा हर जगह पशुबलि की जगह ही शुरू हुई। अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में नारियल का अपना स्वतंत्र पवित्र और मंगल प्रतीक के रूप में भी महत्त्व है।
नवरात्रि में महाअष्टमी या महानवमी के दिन होम करने की परंपरा कई परिवारों में चलती है। कुछ जगह दुर्गासप्तशती का पठन, मंत्रजप, चंडीहोम या नवचंडी यज्ञ जैसी विधियां होती हैं। हवन में अग्निदेवता को मंत्रोच्चार के साथ घी, समिधा और तय हवनसामग्री अर्पित की जाती है। विधि के आखिर की अंतिम आहुति पूर्णाहुति कहलाती है, जो यज्ञ की समाप्ति और संकल्प पूरा होने का प्रतीक है।
कुछ परंपराओं में पूर्णाहुति के लिए नारियल लिया जाता है। नारियल के साथ घी, कपूर या दूसरी हवनसामग्री भी चढ़ाई जा सकती है। पूर्णाहुति देते समय भक्त देवी से प्रार्थना करता है कि पूजा में कोई कमी रह गई हो तो माफ करें और इस अनुष्ठान का पुण्य सबकी भलाई के लिए मिले। इस तरह पूर्णाहुति सिर्फ होम की आखिरी आहुति नहीं, बल्कि पूरी साधना को देवी के चरणों में समर्पित करने की भावपूर्ण क्रिया है।
नवरात्रि की महाअष्टमी और महानवमी, दोनों तिथियों का देवी की उपासना में खास महत्त्व है। महाअष्टमी पर दुर्गादेवी की विशेष पूजा, दुर्गाष्टमी व्रत और कन्यापूजन होता है, और कुछ परंपराओं में चंडीहोम किया जाता है। देवी के शक्तिरूप की आराधना करके भक्त संकटों से लड़ने की ताकत मिलने की प्रार्थना करते हैं।
नवरात्रि के नौवें दिन महानवमी पर सिद्धिदात्री देवी की पूजा होती है। कई परंपराओं में इस दिन हवन, पूर्णाहुति, कन्यापूजन और नवरात्रव्रत की समाप्ति की विधियां की जाती हैं। कुछ परिवारों में होम अष्टमी को होता है, तो कुछ में नवमी को। यह चुनाव स्थानीय परंपरा, कुलाचार, उपासना के संकल्प और पंचांग के हिसाब से किया जाता है। दोनों दिन देवी की कृपा की प्रार्थना के लिए अहम माने जाते हैं, और होम के आखिर में नारियल अर्पित करके भक्त अपनी नवरात्र साधना पूरी करता है।
धार्मिक विधि में श्रद्धा के साथ सही तरीके का पालन भी जरूरी बताया गया है। नारियल चढ़ाने के पीछे सिर्फ कोई इच्छा पूरी होने का मकसद नहीं होता, बल्कि मन के दोष दूर करके अच्छे गुण अपनाने की भावना भी होती है।