नवरात्रि का पांचवां दिन स्कंदमाता को समर्पित, जानिए पूजा की विधि और पीले रंग की अहमियत
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गुरुवार, 15 अक्टूबर को नवरात्रि का पांचवां दिन है। इस दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। नवदुर्गा में स्कंदमाता देवी का पांचवां रूप हैं। स्कंदमाता भगवान कार्तिकेय की माता हैं, जिन्हें स्कंद भी कहा जाता है। इसी वजह से देवी को यह नाम मिला, ऐसी धार्मिक मान्यता है।
देवी की मूर्ति में बाल स्कंद उनकी गोद में बैठे दिखाई देते हैं। देवी कमल पर विराजमान होती हैं, इसलिए उन्हें पद्मासना भी कहा जाता है। यह स्वरूप मातृत्व, प्रेम, वात्सल्य और रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
इस साल पांचवें दिन का रंग पीला है। पीले रंग को आनंद, सकारात्मकता, ज्ञान, समृद्धि और उत्साह का प्रतीक माना जाता है। इसलिए इस दिन पीले कपड़े पहनकर देवी की पूजा करने को कहा गया है। पूजा में पीले फूल या पीले रंग की पूजा सामग्री का इस्तेमाल करना चाहिए।
पूजा की विधि यह है कि सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहने जाएं। देवी के सामने दीया जलाकर पीले फूल, अक्षत और नैवेद्य चढ़ाया जाता है। इसके बाद स्कंदमाता की आरती और नामस्मरण किया जाता है। इस दिन "ओम देवी स्कंदमातेय नमः" मंत्र का जाप करना चाहिए।
नैवेद्य की बात करें तो कई जगहों पर स्कंदमाता को केले का भोग चढ़ाने की परंपरा है। इसके अलावा खीर, पंचामृत, हल्दी, मीठे पकवान और परंपरा के हिसाब से सात्विक पदार्थ भी नैवेद्य में रखे जाते हैं।
देवी की पूजा के साथ अपने बच्चों की सेहत, उनकी खुशी और परिवार की भलाई के लिए प्रार्थना करने को भी कहा गया है। मान्यता है कि भक्ति भाव से स्कंदमाता की पूजा करने पर शांति, सुख, सकारात्मकता और मातृकृपा मिलती है।
स्कंदमाता का स्वरूप मां के प्रेम और अपनी संतान की रक्षा करने की ताकत की याद दिलाता है। इसी वजह से इस दिन खास तौर पर बच्चों की सेहत और सुख के लिए प्रार्थना की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक भक्ति भाव से की गई पूजा से मन को शांति और सकारात्मकता की प्रेरणा मिलती है। नवरात्रि का पांचवां दिन इसी वजह से खास तौर पर मातृत्व और प्रेम की शक्ति को याद करने का दिन माना जाता है।
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