गुरूवार, 5 नवंबर 2026

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नवनाथ संप्रदाय के पांचवें नाथ गहिनीनाथ महाराज: जन्म की कथा, कार्य और बीड का समाधिस्थल

नवनाथ संप्रदाय के पांचवें नाथ गहिनीनाथ महाराज: जन्म की कथा, कार्य और बीड का समाधिस्थल तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

संत निवृत्तीनाथ को अनुग्रह देने वाले गहिनीनाथ महाराज का स्थान, जन्म की कथा, कार्य और संजीवन समाधिस्थल।

श्री संत गहिनीनाथ महाराज, जिन्हें गैनीनाथ भी कहा जाता है, नवनाथ संप्रदाय के बेहद पूजनीय, सिद्ध और तेजस्वी महायोगी माने जाते हैं। नाथ संप्रदाय और महाराष्ट्र के वारकरी संप्रदाय को जोड़ने वाली मुख्य कड़ी के रूप में उन्हें देखा जाता है। उनके स्थान, जन्म, कार्य और समाधिस्थल के बारे में यहां जानकारी दी जा रही है।

पारंपरिक नवनाथ सूची और 'नवनाथ भक्तिसार' ग्रंथ में आए उल्लेखों के मुताबिक गहिनीनाथ नवनाथों में पांचवें नाथ माने जाते हैं। उन्हें विष्णु के अवतार 'करभाजन नारायण' का रूप माना जाता है। वे गुरु गोरक्षनाथ के पट्टशिष्य थे।

गहिनीनाथ महाराज का कोई पक्का ऐतिहासिक काल उपलब्ध नहीं है, फिर भी माना जाता है कि वे 12वीं से 13वीं सदी के बीच हुए। उनके जन्म की कथा गूढ़ और अलौकिक बताई जाती है। ग्रंथों में लिखी कथा के अनुसार एक बार गुरु गोरक्षनाथ संजीवनी मंत्र का अभ्यास कर रहे थे। उसी वक्त खेलते-खेलते बच्चों ने मिट्टी का एक पुतला बना दिया था। गोरक्षनाथ की मंत्रशक्ति से उस पुतले में प्राण आ गए और एक सुंदर बालक का जन्म हुआ। कीचड़ या मिट्टी से जन्म होने की वजह से उन्हें 'गहिनीनाथ' (गूढ़ या गंदले पानी से आया हुआ) नाम मिला।

मच्छिंद्रनाथ और गोरक्षनाथ ने इस बालक को कनकागिरी गांव के निःसंतान ब्राह्मण दंपती मधुशर्मा (मधुब्राह्मण) और गंगाबाई के हवाले कर दिया। उन्होंने ही गहिनीनाथ की परवरिश की। आगे चलकर जब वे 7 साल के हुए, तब गोरक्षनाथ उन्हें गर्भाद्री पर्वत पर ले गए और सारी विद्या और दीक्षा दी।

वारकरी संप्रदाय के आद्य प्रेरक के तौर पर भी उन्हें माना जाता है। उनका सबसे बड़ा काम यह बताया जाता है कि उन्होंने संत निवृत्तीनाथ को, जो संत ज्ञानेश्वर के बड़े भाई थे, त्र्यंबकेश्वर के पहाड़ पर अनुग्रह यानी दीक्षा दी। गहिनीनाथ ने निवृत्तीनाथ को सिर्फ योगसाधना नहीं सिखाई, बल्कि 'कृष्ण की भक्ति' को लोगों के बीच फैलाने का आदेश भी दिया। निवृत्तीनाथ ने यही दीक्षा संत ज्ञानेश्वर को दी, और इसी से आगे महाराष्ट्र में महान वारकरी संप्रदाय की नींव पड़ी।

योगविद्या के साथ गहिनीनाथ ने आयुर्वेद और औषधीय वनस्पतियों का भी अपार ज्ञान हासिल किया था और उसका इस्तेमाल लोगों की भलाई के लिए किया। नाथ पंथ की कठिन योगसाधना को उन्होंने आसान बनाकर उसमें भक्ति जोड़ दी, जिससे आम लोगों के लिए भी आध्यात्मिक रास्ता सरल हो गया।

श्री क्षेत्र गहिनीनाथ गढ़ उनका मुख्य संजीवन समाधिस्थल है। यह जगह चिंचोली, तालुका पाटोदा, जिला बीड (महाराष्ट्र) में है। कुछ दस्तावेज़ों में इस क्षेत्र को अहमदनगर-बीड सीमा पर बताया गया है।

इस गढ़ की खासियत यह है कि यहां महाराज का मूल समाधि मंदिर है। कहा जाता है कि मुगल दौर में बाहरी हमलावरों से बचाने के लिए इस समाधि को चबूतरे जैसा, यानी कब्र जैसा रूप दे दिया गया था। औरंगजेब ने इस जगह को 'गैरीपीर' या 'गैबीपीर' नाम दिया था, लेकिन यह असल में गहिनीनाथ महाराज का ही पवित्र समाधि स्थान है। आज यह गढ़ 'गहिनीनाथ गढ़' के नाम से जाना जाता है और नाथ और वारकरी अनुयायियों की बड़ी आस्था का केंद्र है।

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