सत्यभामा की जिद पर श्रीकृष्ण स्वर्ग से द्वारका लाए पारिजातक वृक्ष, जानिए कथा
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पौराणिक कथा के मुताबिक नारदमुनी की लाई फुलों से शुरू हुई बात श्रीकृष्ण और इंद्र के संघर्ष तक पहुंची।
भारतीय पौराणिक कथाओं में पेड़, फूल और वनस्पतियों को सिर्फ सुंदरता की निशानी नहीं माना गया है। उनसे श्रद्धा, भक्ति और कई दिलचस्प आख्यायिकाएं भी जुड़ी हैं। ऐसा ही एक सुगंधित, पवित्र और खास वृक्ष है पारिजातक, जिसे प्राजक्त भी कहा जाता है। रात में खिलने वाले सफेद फूल, उनकी केसरिया डंडी और सुबह जमीन पर बिछी फूलों की चादर इस पेड़ को सबका मन मोह लेने वाला बना देती है। पौराणिक कथा के अनुसार यह दिव्य वृक्ष स्वर्ग से धरती पर कैसे आया, इसकी कहानी और भी दिलचस्प है।
पौराणिक मान्यता के मुताबिक देवताओं और दानवों ने जो समुद्रमंथन किया, उससे कई दिव्य रत्न निकले। कुछ पुराणकथाओं में कहा गया है कि इनमें पारिजातक वृक्ष भी शामिल था। समुद्रमंथन से मिले इस वृक्ष को देवराज इंद्र ने स्वर्ग के नंदनवन में लगाया। स्वर्ग के इस पेड़ के फूल बेहद सुगंधित और मनमोहक थे, इसी वजह से पारिजातक को देववृक्ष के रूप में खास अहमियत मिली।
द्वापरयुग की एक कथा के अनुसार एक बार देवर्षि नारदमुनी स्वर्ग से पारिजातक के फूल लेकर आए। उन्होंने ये फूल भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए। श्रीकृष्ण ने वे फूल अपनी पत्नी देवी रुक्मिणी को दे दिए और रुक्मिणी ने उन्हें अपने बालों में सजा लिया।
श्रीकृष्ण की दूसरी पत्नी सत्यभामा को जब यह बात पता चली, तो उन्हें भी पारिजातक के फूल चाहिए थे। लेकिन चंद फूलों से उनका मन नहीं भरा। उन्होंने श्रीकृष्ण से जिद की कि पूरा पारिजातक वृक्ष ही लाकर उनके आंगन में लगाया जाए। सत्यभामा की यह इच्छा पूरी करने के लिए श्रीकृष्ण ने स्वर्ग से पारिजातक वृक्ष धरती पर लाने का फैसला किया।
इसके लिए श्रीकृष्ण स्वर्ग गए और देवराज इंद्र से पारिजातक वृक्ष मांगा। मगर इंद्र ने स्वर्ग की दिव्य संपत्ति को पृथ्वी पर ले जाने का विरोध किया। इससे दोनों के बीच संघर्ष छिड़ गया। पौराणिक कथा के मुताबिक श्रीकृष्ण ने इंद्र को हराकर पारिजातक वृक्ष धरती पर उतारा। गरुड़ की मदद से यह वृक्ष द्वारका लाया गया। इस तरह स्वर्ग के दिव्य पारिजातक के पृथ्वी पर आने की कथा प्रचलित हुई।
कथा में एक और सुंदर मोड़ है। पारिजातक वृक्ष सत्यभामा के आंगन में लगाया गया, लेकिन श्रीकृष्ण ने उसे इस तरह लगाया कि पेड़ सत्यभामा के आंगन में होने पर भी उसके फूल पड़ोस में रुक्मिणी के आंगन में गिरते थे।
इस प्रसंग से श्रीकृष्ण की चतुराई और अपनी दोनों पत्नियों के बीच प्रेम बनाए रखने के उनके हुनर का पता चलता है। सत्यभामा को पूरा वृक्ष मिला, तो रुक्मिणी को भी उसके फूलों की खुशबू और सुंदरता का आनंद मिला। इस कथा के पीछे यही लोकमान्यता है।
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