गुरूवार, 5 नवंबर 2026

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धनत्रयोदशी पर लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति लेने से पहले इन बातों पर दें ध्यान

धनत्रयोदशी पर लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति लेने से पहले इन बातों पर दें ध्यान तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

दिवाली पूजा के लिए मूर्ति खरीदने जा रहे हैं तो सूंड की दिशा, आसन, सामग्री और मूर्ति की बनावट देख लें।

दिवाली की पूजा की तैयारी शुरू होते ही बाजारों में लक्ष्मी और गणेश की मूर्तियां खरीदने वालों की भीड़ बढ़ने लगती है। इस साल धनत्रयोदशी 6 नवंबर 2026 को मनाई जा रही है। कई घरों में परंपरा है कि धनत्रयोदशी के शुभ दिन नई मूर्तियां घर लाई जाती हैं और दिवाली के दिन उनकी पूजा होती है। लेकिन सिर्फ मूर्ति की खूबसूरती या उसकी कीमत देखकर खरीद लेना काफी नहीं है। देवी-देवता का स्वरूप, गणेश की सूंड की दिशा, मूर्ति की बैठक और उसे बनाने में लगी सामग्री पर भी नजर रखना जरूरी है।

लक्ष्मीमाता की मूर्ति के बारे में कहा गया है कि धनत्रयोदशी पर कमल के फूल पर विराजमान मूर्ति लेना शुभ माना जाता है। कमल को पवित्रता, समृद्धि और संपन्नता का प्रतीक बताया गया है। ऐसी मूर्ति चुनी जा सकती है जिसमें देवी के हाथ में कमल का फूल हो, एक हाथ से सोने के सिक्कों की बारिश हो रही हो और दूसरा हाथ आशीर्वाद की मुद्रा में हो। देवी के चेहरे पर प्रसन्नता और शांति का भाव होना चाहिए। यह कहना ठीक नहीं कि लक्ष्मीमाता की खड़ी मूर्ति घर में नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि धार्मिक परंपराओं में खड़े और बैठे, दोनों स्वरूपों को जगह मिली है। फिर भी दिवाली की घरेलू पूजा के लिए कमल पर बैठी मूर्ति ही ज्यादातर चुनी जाती है।

गणेश की मूर्ति लेते समय सूंड की दिशा अहम मानी जाती है। घर की रोज की पूजा के लिए बाईं ओर मुड़ी सूंड वाली वाममुखी गणेश मूर्ति चलन में है। दाईं ओर मुड़ी सूंड वाली मूर्ति को दक्षिणमुखी गणेश कहते हैं, और कुछ धार्मिक परंपराओं में इस स्वरूप की पूजा के लिए खास नियम बताए गए हैं। गणेश के हाथ में मोदक या लड्डू और पास में मूषक हो तो अच्छा माना जाता है। मूर्ति का चेहरा प्रसन्न और मुद्रा शांत होनी चाहिए।

बाजार में लक्ष्मी-गणेश की अलग-अलग मूर्तियां भी मिलती हैं और एक ही आसन पर बनी संयुक्त मूर्तियां भी। घरेलू पूजा के लिए अलग मूर्तियां सुविधाजनक रहती हैं, क्योंकि इससे दोनों देवताओं को अलग आसन दिया जा सकता है। संयुक्त मूर्ति भी खरीदी जा सकती है, बस दोनों का स्वरूप साफ दिखना चाहिए। कोई भी मूर्ति खंडित या टूटी हुई नहीं होनी चाहिए।

सामग्री की बात करें तो सालाना दिवाली पूजा के लिए मिट्टी की मूर्ति अच्छा विकल्प है, और उसे प्राकृतिक रंगों से सजाया गया हो तो बेहतर। पीतल की मूर्ति टिकाऊ होती है और हर साल साफ करके दोबारा इस्तेमाल की जा सकती है। चांदी की मूर्ति को लंबे समय तक संभालकर रखा जा सकता है और रोज की पूजा में भी लिया जा सकता है। प्लास्टर ऑफ पेरिस की मूर्तियों के मुकाबले मिट्टी या पर्यावरण के अनुकूल सामग्री को तरजीह देनी चाहिए। प्लास्टर ऑफ पेरिस पानी में आसानी से नहीं घुलता, इसलिए विसर्जन के वक्त जलस्रोतों को नुकसान पहुंच सकता है।

खरीदते समय देख लें कि मूर्ति के हाथ, पैर, मुकुट, चेहरा और तली ठीक हैं या नहीं। कहीं दरार या टूटा हिस्सा न हो। रंग साफ और अच्छी क्वालिटी के हों, तेज बदबू वाले या घटिया रंग से बचें। मूर्ति का आकार ऐसा हो कि घर के देवघर या पूजा की चौकी पर आराम से आ जाए। बड़ी मूर्ति लेनी हो तो यह भी देखें कि उसके लिए जगह और देखभाल का इंतजाम है या नहीं।

मोलभाव को लेकर कुछ परिवारों में परंपरा है कि देवी-देवताओं की मूर्ति खरीदते वक्त भाव नहीं किया जाता। मगर सभी हिंदू परंपराओं में ऐसा कोई जरूरी नियम नहीं है। दुकानदार से दाम पूछकर अपनी पसंद और बजट के हिसाब से खरीदा जा सकता है। स्थानीय मूर्तिकारों से मूर्ति लेते हों तो उनकी मेहनत और कला का सही दाम देना जरूरी है।

मूर्ति घर लाते समय उसे साफ कपड़े में रखकर पूजा की जगह तक ले जाएं। दिवाली की पूजा से पहले चौकी साफ करके उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं, फिर लक्ष्मी और गणेश की सही जगह पर स्थापना करें। पूजा में फूल, अक्षत, रोली, चंदन, मिठाई और फल चढ़ाए जाते हैं। दीया जलाकर दोनों देवताओं की आरती की जाती है। गणेश को मोदक या लड्डू और लक्ष्मीमाता को खील-बताशे या मिठाई का भोग लगाया जा सकता है। मूर्ति खरीदने से लेकर स्थापना तक हर चरण श्रद्धा और ठीक देखभाल के साथ पूरा करना चाहिए।

लक्ष्मी-गणेश की मूर्ति के स्वरूप, सूंड की दिशा और पूजा-विधि को लेकर अलग-अलग परिवारों और परंपराओं में मतभेद हो सकते हैं। इसलिए मूर्ति खरीदने का फैसला अपनी श्रद्धा, पारिवारिक परंपरा और पसंद के हिसाब से लिया जाए।

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