नौजवानों को भड़काना आसान, लीडरशिप के लिए तजुर्बा चाहिए: संजय निरुपम
शिवसेना नेता संजय निरुपम ने पुणे में युवाओं के आंदोलन, मराठा आरक्षण, उद्धव ठाकरे और शिक्षक-स्नातक चुनावों पर अपनी बात रखी।
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शिवसेना के नेता संजय निरुपम का कहना है कि नौजवानों की भावनाओं को छूकर उन्हें आंदोलन के लिए इकट्ठा करना आसान होता है, लेकिन उन्हें सही दिशा देकर मजबूत लीडरशिप खड़ी करना बड़ी चुनौती है। उनके मुताबिक इसके लिए सिर्फ सोशल मीडिया की लोकप्रियता या आंदोलन की लहर काफी नहीं होती। तजुर्बा, संघर्ष, पढ़ाई और अपने भीतर झांकने की आदत भी जरूरी है।
निरुपम पुणे में हमारे कार्यालय आए थे। इस मुलाकात में उन्होंने युवाओं की बदलती सोच, राज्य की सियासी हलचल, मराठा आरक्षण और शिक्षक-स्नातक चुनावों पर बात की।
युवाओं के आंदोलनों की मिसाल देते हुए निरुपम ने नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक और गड़बड़ियों के खिलाफ हुए आंदोलन का जिक्र किया। कॉक्रोज जनता पार्टी (सीजेपी) के अभिजीत दीपके और दूसरे कार्यकर्ताओं ने यह आंदोलन खड़ा किया था। मामला विद्यार्थियों के भविष्य से जुड़ा था, इसलिए इसे छात्रों, अभिभावकों और आम लोगों का खूब साथ मिला। निरुपम ने कहा कि जब इस आंदोलन से जुड़े लोगों ने केंद्रीय चुनाव आयुक्त के खिलाफ राजनीतिक आंदोलन शुरू किया, तो उन्हें मिलने वाला जनसमर्थन घट गया।
संजय राऊत के सियासी बयानों पर निशाना साधते हुए निरुपम ने कहा कि सार्वजनिक जीवन में हर किसी को सोच-समझकर और तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखनी चाहिए। बेबुनियाद आरोपों और सनसनीखेज बयानों से उस नेता की साख पर असर पड़ता है।
मराठा समाज की भूमिका को महाराष्ट्र की राजनीति में अहम बताते हुए निरुपम ने कहा कि इस समाज के नौजवानों के रोजगार, आरक्षण और कुणबी प्रमाणपत्रों के सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। उन्होंने कहा कि मराठा आरक्षण आंदोलन के पीछे की बेचैनी को समझना चाहिए और उस पर ठोस हल निकालने की जरूरत है।
मुंबई में मराठी भाषा का सम्मान बना रहे और रोजमर्रा के कामकाज में मराठी का ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल हो, यह भी निरुपम की राय रही। उन्होंने यह भी कहा कि बड़ी कंपनियों का असर बढ़ने से छोटे कारोबारियों के सामने चुनौतियां खड़ी हो रही हैं। पैकेज्ड दूध की कंपनियों के फैलाव से स्थानीय दूध बेचने वालों के धंधे पर असर पड़ रहा है, यह मुद्दा उठाते हुए उन्होंने छोटे कारोबारियों को बचाने की जरूरत पर जोर दिया।
शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे की विचारधारा का हवाला देकर निरुपम ने उद्धव ठाकरे पर हमला बोला। उनके मुताबिक हिंदुत्व और कांग्रेस का विरोध बालासाहेब की राजनीति की खास पहचान थी। निरुपम का आरोप है कि मुख्यमंत्री बनने की चाहत में उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस के साथ महाविकास अघाड़ी बना ली और बालासाहेब की विचारधारा से दूर चले गए। निरुपम ने यह भी कहा कि एकनाथ शिंदे का शिवसेना से अलग होने का फैसला बालासाहेब की विचारधारा को आगे ले जाने की दिशा में उठाया गया कदम था। इस राय पर संबंधित राजनीतिक पार्टियों की अलग-अलग राय है।
शिक्षक और स्नातक चुनावों पर निरुपम ने कहा कि शिक्षकों की अटकी हुई मांगें, स्नातकों के रोजगार के सवाल और स्थानीय समस्याएं समझने के लिए उम्मीदवारों को वोटरों से सीधी बातचीत करनी होगी। उन्होंने कहा कि शिक्षकों का विधायक शिक्षक ही होना चाहिए। इन चुनावों में निजी संपर्क, स्थानीय स्तर पर संगठन की बुनियाद और तालमेल की खास अहमियत है, ऐसा भी उन्होंने बताया।
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