शनिवार, 7 नवंबर 2026

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नरक चतुर्दशी पर उबटन लगाने की परंपरा: धार्मिक मान्यता और आयुर्वेद से जुड़े कारण

नरक चतुर्दशी पर उबटन लगाने की परंपरा: धार्मिक मान्यता और आयुर्वेद से जुड़े कारण तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

दिवाली में नरक चतुर्दशी की सुबह अभ्यंगस्नान के वक्त शरीर पर उबटन लगाया जाता है। इसके पीछे पौराणिक कथा, आध्यात्मिक मान्यता और आयुर्वेद से जुड़े कारण बताए जाते हैं।

दिवाली के दौरान, खासकर नरक चतुर्दशी की सुबह अभ्यंगस्नान करते वक्त शरीर पर उबटन लगाने की प्राचीन परंपरा है। उबटन लगाने को शरीर और मन को शुद्ध करने का प्रतीक माना जाता है। इसके पीछे तीन मुख्य कारण गिनाए जाते हैं: धार्मिक, आध्यात्मिक और वैज्ञानिक यानी आयुर्वेदिक।

उबटन में हल्दी, चंदन, नागरमोथा, कचोरा और वाला जैसी प्राकृतिक चीज़ें डाली जाती हैं।

मान्यता है कि इस परंपरा की शुरुआत पौराणिक काल में नरकासुर के वध की कथा से हुई। श्रीमद्भागवत पुराण के मुताबिक प्राग्ज्योतिषपुर का क्रूर राजा नरकासुर देवताओं और इंसानों को सताता था। उसने 16 हजार स्त्रियों को कैद कर रखा था। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को भगवान श्रीकृष्ण और सत्यभामा ने नरकासुर का वध किया और दुनिया को उसके अत्याचार से छुटकारा दिलाया।

कथा के अनुसार नरकासुर को मारने के बाद श्रीकृष्ण के शरीर पर खून के दाग थे और वे युद्ध से थके हुए थे। उन्हें साफ करने और थकान उतारने के लिए उनके शरीर पर खुशबूदार तेल और उबटन लगाकर मंगल स्नान कराया गया। इस जीत का जश्न मनाने और नरकासुर के अत्याचार से आज़ाद होने की खुशी में प्रजा ने दीये जलाए। इस जीत और श्रीकृष्ण के उसी मंगल स्नान को अभ्यंगस्नान कहा जाता है। तभी से यह परंपरा आसुरी प्रवृत्तियों के नाश और अपने भीतर की नकारात्मकता, यानी अज्ञान और आलस, को धो डालने के प्रतीक के रूप में चली आ रही है।

आध्यात्मिक पक्ष की बात करें तो धर्मशास्त्र के अनुसार उबटन सात्त्विक और रजोगुणी वनस्पतियों से बनता है। कहा जाता है कि इसे शरीर पर लगाने से इंसानी शरीर की ब्रह्मांड से सात्त्विक तरंगें और चैतन्यकण ग्रहण करने की क्षमता बढ़ती है। आध्यात्मिक समझ यह भी है कि तेल और उबटन मलकर नहाने से शरीर के आसपास मौजूद परेशान करने वाले स्पंदन दूर होने में मदद मिलती है।

वैज्ञानिक और आयुर्वेदिक नज़रिए से देखें तो दिवाली शरद ऋतु के खत्म होने और हेमंत ऋतु, यानी ठंड के दिनों, की शुरुआत के वक्त आती है। मौसम के इस बदलाव का शरीर पर बड़ा असर पड़ता है। ठंड में हवा सूख जाती है, जिससे त्वचा रूखी और बेजान हो जाती है। उबटन में मौजूद हल्दी, चंदन, नागरमोथा, कचोरा और वाला जैसी प्राकृतिक व औषधीय वनस्पतियां त्वचा की नमी और चिकनाई बनाए रखती हैं।

उबटन लगाने से पहले शरीर पर गुनगुना तिल का तेल लगाया जाता है, जिसे अभ्यंग कहते हैं। इसके बाद उबटन लगाकर हल्के हाथ से मालिश करने पर शरीर में खून का दौरा यानी ब्लड सर्कुलेशन सुधरता है। इससे थकान दूर होती है और नई ऊर्जा मिलती है।

उबटन को प्राचीन समय से इस्तेमाल होने वाला प्राकृतिक सौंदर्य प्रसाधन भी बताया गया है। यह त्वचा की मृत कोशिकाओं और जमी हुई धूल को हटाकर त्वचा को साफ और चमकदार बनाता है। कहा गया है कि उबटन लगाना सिर्फ दिवाली का शौक नहीं है। मौसम बदलने के वक्त सेहत ठीक रखने और मन की नकारात्मकता दूर करने के लिए पूर्वजों ने जो जीवनशैली शुरू की, यह उसी का हिस्सा है।

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