क्या द्रौपदी ने भी रखा था करवा चौथ का व्रत? श्रीकृष्ण ने सुनाई थी यह कथा
करवा चौथ की जड़ महाभारत की कथा में बताई जाती है, जहां श्रीकृष्ण ने अर्जुन के तपस्या पर जाने के बाद चिंतित द्रौपदी को यह व्रत करने को कहा था।
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करवा चौथ अब कुछ ही दिन दूर है। इस दिन शादीशुदा औरतें अपने पति की लंबी उम्र के लिए कड़ा उपवास रखती हैं। पूरे दिन अन्न का दाना और पानी की एक बूंद तक नहीं लेतीं। शाम को व्रत की कथा सुनती हैं और रात में चांद का दर्शन करके उपवास खोलती हैं। इस त्योहार की जड़ महाभारत की एक पुरानी कथा में है। खुद भगवान श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को यह व्रत करने के लिए कहा था।
कथा महाभारत की है। अर्जुन एक बार देवताओं से दिव्य शस्त्र पाने के लिए पर्वत पर तपस्या करने गए थे और कई दिन तक घर नहीं लौटे। अर्जुन के न होने से द्रौपदी को अकेलापन लगने लगा। उन्हें लगने लगा कि घर में भी और बाहर भी हर तरफ संकट ही संकट है। मन में हर वक्त डर और फिक्र बनी रहती थी। ऐसे में उन्हें सिर्फ कृष्ण का सहारा याद आया। उन्होंने कृष्ण को पुकारा और कहा, "कृष्ण, अर्जुन नहीं हैं, मुझे कुछ सूझ नहीं रहा, सब कुछ मुश्किल लग रहा है, कोई रास्ता दिखाओ।"
तब कृष्ण ने उन्हें हिम्मत बंधाई और एक व्रत बताया। उन्होंने कहा, "एक व्रत है, उसका नाम कर्क चतुर्थी है, जिसे हम करवा चौथ कहते हैं। औरतें यह व्रत अपने पति की भलाई के लिए करती हैं। इससे गृहस्थी में सुख आता है और अड़चनें दूर होती हैं।"
कृष्ण यहीं नहीं रुके। उन्होंने द्रौपदी को एक और बात सुनाई। वे बोले, "ऐसा ही सवाल एक बार देवी पार्वती ने भगवान शंकर से पूछा था। मैं अपने पति के लिए क्या करूं, जिससे उनका कल्याण हो? तब शंकर ने पार्वती को यही व्रत करने को कहा था। यह व्रत करने से वैवाहिक जीवन की रुकावटें हट जाती हैं और अखंड सौभाग्य मिलता है।"
यह सब सुनकर द्रौपदी का मन शांत हो गया। उन्होंने तय किया कि वे भी यह व्रत करेंगी। फिर उन्होंने पूरे मन से और नियम के मुताबिक व्रत रखा। करवा देवी की, शंकर और पार्वती की पूजा की। इस व्रत की पूरी कथा कृष्ण के मुंह से ही सुनी। शाम को चांद को अर्घ्य देकर उन्होंने उपवास खोला। माना जाता है कि इस व्रत से उनकी जिंदगी की सारी तकलीफें खत्म हो गईं।
अब बात पूजा के तरीके की। सुबह जल्दी उठकर नहाना होता है, घर और देवघर की सफाई करनी होती है। भोर में सास की दी हुई सरगी खाई जाती है। सरगी खाने के बाद भगवान का नाम लेकर संकल्प किया जाता है कि आज दिन भर कुछ खाऊंगी-पिऊंगी नहीं।
शाम होते ही पूजा की तैयारी शुरू होती है। एक जगह थोड़ी मिट्टी लेकर छोटी वेदी बनाई जाती है और उस पर देवी-देवताओं को बैठाया जाता है। सामने एक करवा, यानी छोटा मटका, रखा जाता है। उसमें पानी भरकर उसकी पूजा की जाती है। अगरबत्ती और दिया जलाया जाता है, कुमकुम, हल्दी और चंदन लगाया जाता है।
चांद निकलने से पहले सब औरतें एक साथ बैठकर व्रत की कथा सुनती हैं। चांद निकलने पर पहले छलनी से चांद को देखा जाता है, उसे पानी का अर्घ्य दिया जाता है और फिर पति का चेहरा देखा जाता है। इसके बाद ही उपवास खोला जाता है। उपवास खोलने के बाद बहू अपनी सास को प्रणाम करती है। उन्हें मिठाई, फल, सूखा मेवा और कुछ पैसे देकर आशीर्वाद लेती है। कई घरों में कुमकुम, चूड़ियां, बिंदी, आईना, कंघी जैसी सुहाग की चीजें भी सास या घर की किसी बड़ी औरत को दी जाती हैं। हर राज्य और हर घर में तरीका थोड़ा अलग होता है, लेकिन मकसद एक ही रहता है, पति की लंबी उम्र के लिए प्रार्थना।
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