शनिवार, 7 नवंबर 2026

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14 साल का वनवास पूरा कर राम लौटे, तो लाखों दीयों से जगमगा उठी अयोध्या नगरी

14 साल का वनवास पूरा कर राम लौटे, तो लाखों दीयों से जगमगा उठी अयोध्या नगरी तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
कल्चर PT24 टीम

कार्तिक अमावस्या की अंधेरी रात में अयोध्या के लोगों ने दीये जलाकर, रंगोली सजाकर और वाद्य बजाकर प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण का स्वागत किया।

14 साल का वनवास पूरा करने और लंकापति रावण का वध करने के बाद प्रभु श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटे। अयोध्या की जनता ने उनका स्वागत बेहद उत्साह से किया। उस स्वागत की तैयारी और जश्न को ही भारतीय संस्कृति के सबसे बड़े त्योहार 'दिवाली' के रूप में मनाया जाता है।

जिस दिन राम लौटे, वह कार्तिक महीने की अमावस्या थी। अमावस्या की उस अंधेरी रात को रोशन करने के लिए पूरी अयोध्या नगरी में लाखों मिट्टी के दीये (दीपक) जलाए गए। हर किसी ने अपने घर की छत, आंगन और गली-गली में शुद्ध घी के दीये लगाए। पूरी अयोध्या सुनहरी रोशनी में नहा उठी। इसी वजह से इस दिन को 'दीपावली' यानी दीयों की कतार कहा गया।

राम के आने की खबर मिलते ही पूरी नगरी की सफाई की गई और सड़कें धोई गईं। घरों और महलों पर रंग-बिरंगी झंडियां (पताका) और फूलों के सुंदर तोरण लगाए गए। हर घर के दरवाजे के सामने बड़ी और आकर्षक रंगोलियां बनाई गईं। पूरे शहर में खुशबूदार फूलों और इत्र का छिड़काव किया गया, जिससे माहौल महक उठा।

रामराज्य की वापसी की खुशी में अयोध्या की जनता झूम उठी। चौक-चौराहों पर ढोल, ताशे, शंख और मृदंग जैसे मंगल वाद्य बज रहे थे। लोग नाचते हुए और राम के नाम का जयघोष करते हुए गाने गा रहे थे। 14 साल की जुदाई खत्म होने से हर नागरिक की आंखों में खुशी के आंसू थे।

राम जैसे ही अयोध्या की सीमा पर पहुंचे, उनके भाई भरत और शत्रुघ्न, साथ ही माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी भावुक होकर उनसे मिलने गए। भरत ने राम के चरणों में लेटकर उनका स्वागत किया।

इसके बाद राम को पूरे सम्मान के साथ राजमहल लाया गया। वसिष्ठ ऋषि और दूसरे ऋषि-मुनियों की मौजूदगी में प्रभु श्रीराम का भव्य राज्याभिषेक हुआ। अयोध्या का राज एक बार फिर राम के हाथों में सौंपा गया।

इस खुशी के मौके पर पूरी अयोध्या में मिठाई बांटी गई और अन्नदान किया गया। गरीबों को कपड़े और कीमती चीजें दान में दी गईं। राम के स्वागत के लिए अयोध्या का हर घर मंदिर की तरह सजा था। यह सिर्फ एक राजा की वापसी का सफर नहीं था, बल्कि अधर्म पर धर्म और सत्य की जीत का जश्न था, जिसे हर साल 'दिवाली' के रूप में उतने ही उत्साह से मनाया जाता है।

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