म्यूचुअल फंड निवेशक की मौत के बाद पैसे पर किसका हक? SEBI के नए नियम
SEBI के नए ट्रांसमिशन नियमों में तीन श्रेणियां हैं: संयुक्त होल्डिंग, नॉमिनी वाला सिंगल होल्डर और बिना नॉमिनी वाला सिंगल होल्डर। हर श्रेणी के लिए कागजात अलग हैं।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
अगर आप या आपके परिवार का कोई सदस्य म्यूचुअल फंड में पैसा लगाता है, तो यह जानना जरूरी है कि निवेशक की मौत के बाद यूनिट्स किसके नाम होंगी। SEBI ने म्यूचुअल फंड ट्रांसमिशन के लिए नया ढांचा जारी किया है, जिससे यह प्रक्रिया पहले से काफी आसान हो गई है।
पहले नॉमिनी की छोटी और मामूली गलतियों पर भी क्लेम खारिज कर दिए जाते थे। क्लेम दाखिल करने के लिए एक तय समय सीमा भी थी। नए नियम तीन श्रेणियों में बंटे हैं और हर श्रेणी के लिए अलग व्यवस्था है।
पहली श्रेणी संयुक्त होल्डिंग की है। अगर पति और पत्नी ने मिलकर म्यूचुअल फंड में निवेश किया है और एक होल्डर की मौत हो जाती है, तो जीवित साथी के लिए प्रक्रिया सीधी है। नए नियमों के मुताबिक AMC को अब जीवित संयुक्त होल्डर से KYC, क्षतिपूर्ति बंधपत्र या हमीपत्र जैसे कागजात बार-बार मांगने की जरूरत नहीं है। सिर्फ मृतक का मृत्यु प्रमाणपत्र देने पर पूरा खाता दूसरे होल्डर के नाम हो जाएगा।
दूसरी श्रेणी में फंड सिर्फ एक व्यक्ति के नाम पर है, लेकिन कागजात में नॉमिनी का नाम पहले से दर्ज है। ऐसे में नॉमिनी AMC या RTA के पास ट्रांसफर की अर्जी दे सकता है। इसके लिए ट्रांसफर रिक्वेस्ट फॉर्म, जांचा जा सकने वाला मृत्यु प्रमाणपत्र और होल्डिंग्स का अकाउंट स्टेटमेंट देना होगा। यहां एक बात समझनी चाहिए कि नॉमिनी होने का मतलब यह नहीं कि वह व्यक्ति फंड का कानूनी मालिक बन गया। SEBI के नए ढांचे में नॉमिनी को मृत निवेशक के कानूनी वारिसों की ओर से trustee के तौर पर संपत्ति मिलती है। AMC का नॉमिनी को यूनिट्स ट्रांसफर करना उसकी जिम्मेदारी पूरी करता है, पर असली मालिक का फैसला उत्तराधिकार कानून के हिसाब से होता है।
तीसरी श्रेणी सबसे पेचीदा है, जिसमें फंड एक ही व्यक्ति के नाम है और नॉमिनी दर्ज नहीं है। निवेशक ने नामित व्यक्ति की कोई जानकारी नहीं दी है, इसलिए पति या पत्नी, बच्चे या माता-पिता में से पैसा किसे मिलेगा, यह तय करना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में दावा करने वाले को साबित करना पड़ता है कि वह मृतक का कानूनी वारिस है। SEBI ने दावे की रकम के हिसाब से अलग रास्ते तय किए हैं।
10,000 रुपये तक के छोटे दावे, SOA मोड के लिए, क्विक ट्रांसमिशन प्रोसेसिंग (QTP) रास्ते से होते हैं। यह रास्ता माता-पिता, पति या पत्नी और बच्चों जैसे करीबी रिश्तेदारों के लिए है। इसमें ट्रांसफर-कम-हमीपत्र, मृत्यु प्रमाणपत्र और रिश्ते का सबूत चाहिए।
10,000 रुपये से 10 लाख रुपये के बीच के दावे सरलीकृत दस्तावेजीकरण की श्रेणी में आते हैं। बुनियादी कागजात के साथ नोटरी से प्रमाणित क्षतिपूर्ति बंधपत्र और कानूनी वारिसों का नोटरी से प्रमाणित शपथपत्र या अनापत्ति प्रमाणपत्र लग सकता है।
10 लाख रुपये से ऊपर के दावों में ज्यादा पक्के कागजात लग सकते हैं, जैसे वसीयत के साथ indemnity bond, कानूनी वारिस प्रमाणपत्र या उत्तराधिकार प्रमाणपत्र। राहत की बात यह है कि हर मामले में वसीयत का प्रोबेट जरूरी नहीं है।
अगर म्यूचुअल फंड की यूनिट्स डीमैट खाते में रखी हैं, तो ये सीमाएं बदल जाती हैं। डीमैट खातों के लिए QTP की सीमा 30,000 रुपये तक और सरल कागजात की सीमा 30 लाख रुपये तक है।
इसके अलावा कुछ और बदलाव भी हुए हैं। अब मूल मृत्यु प्रमाणपत्र हर जगह साथ ले जाना जरूरी नहीं है, क्योंकि SEBI ने QR कोड वाले जांचे जा सकने वाले मृत्यु प्रमाणपत्र भी मान लिए हैं। सभी जरूरी कागजात मिलने के बाद AMC को 21 कैलेंडर दिनों के अंदर ट्रांसमिशन क्लेम पर काम पूरा करना होगा। देरी या क्लेम खारिज होने पर लिखित वजह देनी होगी। क्लेम जमा होते ही प्रोसेस करने वाली संस्था को तुरंत पावती देनी होगी और शुरू में ही कोई गड़बड़ी हो तो बतानी होगी।