मुंबई के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशिष अग्रवाल बोले, हर थकान उम्र का असर नहीं, दिल के वाल्व का भी हो सकता है
मुंबई के इंटरव्हेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. आशिष अग्रवाल ने कहा है कि बार-बार थकान या सांस फूलना सिर्फ बढ़ती उम्र का नतीजा नहीं, हृदय के वाल्व की बीमारी का संकेत भी हो सकता है।
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शाम को रोज टहलने जाने वाले पापा अचानक घर में ही आराम करने लगें, सीढ़ी चढ़ते वक्त मां की सांस फूलने लगे, या घर के बुजुर्ग "उम्र हो गई, और क्या" कहकर अपने रोज के काम धीरे-धीरे कम कर दें, तो यह नजारा कई घरों में आम लगता है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर की ताकत कम होना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन मुंबई के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजिस्ट यानी हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. आशिष अग्रवाल ने चेताया है कि हर बार थकान या सांस फूलना सिर्फ उम्र की निशानी हो, यह जरूरी नहीं। इसके पीछे दिल की कोई गंभीर बीमारी हो सकती है।
डॉ. अग्रवाल के मुताबिक, रोज के कामों के दौरान शुरू में दिखने वाले कुछ लक्षणों को लोग तनाव, व्यस्त दिनचर्या या बढ़ती उम्र का नाम देकर छोड़ देते हैं। मगर नीचे दिए लक्षण लगातार दिखें तो यह चिंता की बात हो सकती है।
ये छह लक्षण हैं: रोज के साधारण काम करते हुए भी सांस फूलना, पहले से ज्यादा थकान और कमजोरी महसूस होना, चक्कर आना या सिर हल्का लगना, पैरों या टखनों के आसपास सूजन आना, चलने या काम करने की रफ्तार धीमी पड़ना, और दिल की धड़कन तेज होना, धड़धड़ाना या अनियमित लगना।
डॉ. अग्रवाल ने बताया कि खासकर 55 साल से ऊपर के लोगों में ये लक्षण हार्ट वॉल्व डिसीज यानी दिल के वॉल्व की बीमारी से जुड़े हो सकते हैं। जब दिल का कोई वॉल्व ठीक से खुलता या बंद नहीं होता, तब खून का बहाव सही रखने के लिए दिल को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है। यह बीमारी बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है और इसके शुरुआती लक्षण बिल्कुल बढ़ती उम्र जैसे लगते हैं। इसी वजह से बीमारी गंभीर दौर तक पहुंचने से पहले उसकी पहचान ही नहीं हो पाती।
डॉ. अग्रवाल ने इसमें परिवार की भूमिका को अहम बताया। उनके मुताबिक, तकलीफ झेल रहा व्यक्ति कई बार खुद डॉक्टर के पास जाने को तैयार नहीं होता या अपनी परेशानी बताता नहीं। ऐसे में घर के युवा और देखभाल करने वाले रिश्तेदार बदले हुए लक्षण सबसे पहले पहचान सकते हैं, जैसे पापा ने सुबह टहलना बंद कर दिया है, मां को सामान उठाने में दिक्कत हो रही है, या कोई बुजुर्ग बार-बार थक रहे हैं। इसलिए इसे सिर्फ उम्र का असर मानकर चुप रहने के बजाय रिश्तेदारों को बात करके उन्हें डॉक्टरी सलाह के लिए राजी करना चाहिए।
जिन लक्षणों की बात हुई, वे पुराने हो रहे हों या बढ़ते दिखें, तो देर किए बिना डॉक्टर की सलाह लेनी चाहिए। डॉ. अग्रवाल ने सलाह दी है कि 55 साल से ऊपर के लोग अपनी नियमित जांच में इकोकार्डियोग्राम (ECHO) टेस्ट को शामिल करें। उनके मुताबिक यह बहुत आसान और बिना दर्द वाली अल्ट्रासाउंड जांच है, जिससे दिल की धड़कन, खून के बहाव और वॉल्व के काम का सटीक पता चलता है। इससे लक्षण गंभीर होने से पहले ही बीमारी पकड़ में आ सकती है।
डॉ. अग्रवाल के अनुसार उम्र बढ़ने का मतलब खुशी और सक्रियता से जीना छोड़ देना नहीं है। सीढ़ी चढ़ना, टहलने जाना या पोते-पोतियों के साथ खेलना बुजुर्ग उम्र में भी मुमकिन है। जरूरत बस इतनी है कि शरीर में होने वाले बदलावों को गंभीरता से देखा जाए। घर का कोई बुजुर्ग अचानक सुस्त पड़ गया हो या थकने लगा हो, तो उसे सिर्फ उम्र की बात न मानकर डॉक्टर से संपर्क करें और समय रहते सही इलाज लें।