कोलेस्ट्रॉल रिपोर्ट नॉर्मल हो तब भी दिल का खतरा रह सकता है, डॉक्टर की सलाह
आदित्य बिड़ला मेमोरियल हॉस्पिटल, पुणे के डॉ. राजीव सेठी ने बताया कि दिल की सेहत सिर्फ कोलेस्ट्रॉल पर नहीं टिकी होती।
दिल की सेहत का ख्याल रखते वक्त ज्यादातर लोग सिर्फ कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रखने पर ध्यान देते हैं। लेकिन कोलेस्ट्रॉल की रिपोर्ट नॉर्मल आ गई, इसका मतलब यह नहीं कि सब कुछ ठीक है। ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, फैमिली हिस्ट्री, नींद, शरीर में जलन (सूजन) और दूसरे मेटाबॉलिक फैक्टर भी हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ा सकते हैं। यह बात वर्ल्ड हार्ट डे के मौके पर सामने आई।
भारत की हालत चिंता वाली है। ICMR-INDIAB की रिसर्च के मुताबिक जांच किए गए बड़ों में से 11.4 प्रतिशत में डायबिटीज, 15.3 प्रतिशत में प्री-डायबिटीज, 35.5 प्रतिशत में हाई ब्लड प्रेशर और 81.2 प्रतिशत में डिस्लिपिडेमिया मिला। इन आंकड़ों से दिखता है कि दिल का ज्यादा ख्याल रखने की जरूरत है।
आदित्य बिड़ला मेमोरियल हॉस्पिटल, पुणे में इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी के डायरेक्टर और सीनियर कंसल्टेंट डॉ. राजीव सेठी ने कहा, "दिल की सेहत पर कोलेस्ट्रॉल के अलावा और भी कई चीजों का असर पड़ता है। फैमिली हिस्ट्री, ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, नींद, शरीर की जलन और दूसरे मेटाबॉलिक फैक्टर से हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ सकता है, जिसमें कोई लक्षण दिखाई नहीं देते।"
फैमिली हिस्ट्री के बारे में कहा गया कि माता-पिता या भाई-बहनों को कम उम्र में हार्ट अटैक या स्ट्रोक आया हो, तो इस बारे में डॉक्टर से बात करना जरूरी है। रूटीन जांच की रिपोर्ट नॉर्मल आए, तब भी फैमिली हिस्ट्री से खतरा बढ़ सकता है। जीन की बनावट लाइपोप्रोटीन(ए), यानी एलपी(ए), के लेवल पर भी असर डाल सकती है। यह कोलेस्ट्रॉल से जुड़ा एक तरह का फैक्टर है, जो ज्यादातर आनुवंशिक होता है और हार्ट डिजीज का खतरा बढ़ा सकता है। लाइफस्टाइल वाले दूसरे फैक्टर के उलट, खानपान या एक्सरसाइज से एलपी(ए) का लेवल ज्यादा नहीं बदलता। जिनकी फैमिली में हार्ट डिजीज का तगड़ा इतिहास है या जिन्हें खतरा ज्यादा है, उनके लिए यह टेस्ट जरूरी बताया गया है।
साफ लक्षण न दिखें, तब भी हार्ट डिजीज हो सकती है। लक्षण दिखने से बहुत पहले से धमनियों में प्लाक जमने लगता है, इसलिए यह बीमारी अक्सर धीरे-धीरे बढ़ती है। ज्यादा जांच की जरूरत हो तो डॉक्टर कुछ खास इमेजिंग टेस्ट करा सकते हैं। इनमें कैल्शियम वाले प्लाक का पता लगाने के लिए कोरोनरी आर्टरी कैल्शियम (सीएसी) स्कोरिंग और धमनियों की तंगी देखने के लिए सीटी कोरोनरी एंजियोग्राफी (सीसीटीए) जैसे टेस्ट शामिल हैं। ये टेस्ट हर किसी के लिए एक जैसे नहीं होते, इसलिए डॉक्टर मरीज की उम्र, खतरे के फैक्टर, लक्षण और मेडिकल कंडीशन देखकर ही इनकी सलाह देते हैं।
ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर और ट्राइग्लिसराइड्स जैसे फैक्टर भी बिना कोई लक्षण दिखाए बिगड़ सकते हैं। हाई ब्लड प्रेशर तो बहुत छुपा रहता है। WHO के अंदाजे के मुताबिक भारत में 220 मिलियन लोगों को हाई ब्लड प्रेशर है, लेकिन इनमें से सिर्फ करीब 12 प्रतिशत का ब्लड प्रेशर कंट्रोल में है। ब्लड शुगर के डायबिटीज के लेवल तक पहुंचने से पहले ही दिल का खतरा बढ़ने लगता है। इसलिए दूसरे फैक्टर के साथ फास्टिंग ग्लूकोज और HbA1c जैसी नियमित जांच से जल्दी पता चल सकता है।
रोजमर्रा की कई अनदेखी चीजों का भी दिल पर असर पड़ता है। कम नींद से हाई ब्लड प्रेशर, मेटाबॉलिक दिक्कतें, मोटापा और हार्ट डिजीज बढ़ने की आशंका रहती है। लंबे वक्त की सूजन से रक्तवाहिनियों को नुकसान होता है और एथेरोस्क्लेरोसिस, यानी धमनियों में प्लाक जमने की प्रक्रिया, तेजी से होती है। शहर की हवा के प्रदूषण और बारीक धूल कणों के लंबे संपर्क से भी दिल और मेटाबॉलिज्म से जुड़े खतरे बढ़ते हैं।
पूरी हार्ट जांच सिर्फ कोलेस्ट्रॉल तक सीमित नहीं होती। इसमें ब्लड प्रेशर, ब्लड शुगर, वजन, कमर का घेरा, धूम्रपान की आदत, नींद की आदतें, फैमिली हिस्ट्री और पहले से मौजूद बीमारियां परखी जाती हैं। मरीज के अपने खतरे का स्तर देखकर डॉक्टर नॉर्मल स्क्रीनिंग की जगह गहरी जांच के लिए एलपी(ए), एपीओबी, सीएसी स्कोरिंग या सीसीटीए जैसे खास टेस्ट की सलाह दे सकते हैं। किसी एक फैक्टर पर टिके बिना हार्ट डिजीज के कुल खतरे को परखा जाए, तो वक्त पर पता चलता है और सही इलाज हो पाता है।