मीरा-भाईंदर में 508 में से सिर्फ 76 कुएं बचे, 432 कुओं का रिकॉर्ड में पता नहीं
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
नगर निगम के ताज़ा आंकड़ों और पुरानी विकास योजना की तुलना में सामने आया कि मीरा-भाईंदर में 432 कुएं गायब हैं।
मीरा-भाईंदर शहर में विकास के नाम पर हुए बेहिसाब निर्माण और बढ़ते शहरीकरण की वजह से पारंपरिक जलस्रोत खत्म होने की कगार पर पहुंच गए हैं। नगर निगम के ताजा आंकड़ों के मुताबिक शहर में अब सिर्फ 76 कुएं बचे हैं। एक समय नगर परिषद के आधिकारिक रिकॉर्ड में 508 कुएं दर्ज थे।
यानी 432 कुओं का कोई अता-पता नहीं चल रहा। ये प्राकृतिक जलस्रोत आखिर गए कहां, यह गंभीर सवाल अब उठ रहा है।
मीरा-भाईंदर शहर बनने से पहले भाईंदर, गोडदेव, नवघर, खारी, घोडबंदर, मिरे, काशी, वरसावे, मुर्धा, राई, मोरवा और डोंगरी जैसे गांवों में कुओं का पानी पीने, घर के कामों और खेती-बागवानी का मुख्य सहारा था। मुंबई से सटा इलाका होने की वजह से यहां शहरीकरण तेजी से हुआ और नगर परिषद आगे चलकर नगर निगम बन गई। लेकिन इस सीमेंट के जंगल में प्राकृतिक पानी के ये भंडार नजरअंदाज होते रहे।
सूचना के अधिकार में नगर रचना विभाग ने पुरानी विकास योजना दी। उसके मुताबिक शहर में 115 सार्वजनिक और 393 निजी, कुल 508 कुएं दर्ज थे। नगर निगम के मौजूदा रिकॉर्ड में सिर्फ 54 सार्वजनिक और 22 निजी, यानी कुल 76 कुएं ही मौजूद हैं।
दोनों आधिकारिक आंकड़ों की तुलना करें तो सार्वजनिक इस्तेमाल के 61 और निजी 37१ नहीं, बल्कि 371 कुएं, कुल मिलाकर 432 कुएं कागज पर भी और जमीन पर भी गायब हैं।
भूजल स्तर बनाए रखने में कुओं का योगदान बहुत अहम होता है। एक तरफ पानी की किल्लत दूर करने और बचे हुए कुओं को संभालने के लिए नगर निगम हर साल करोड़ों रुपये का प्रावधान करता है। दूसरी तरफ असली कुएं ही खत्म हो रहे हैं, जिससे प्रशासन के नियोजन की पोल खुल गई है।
जमीन के आसमान छूते भाव और बिल्डरों के स्वार्थ के चलते यह शक जताया जा रहा है कि इन कुओं को पाटकर उन पर ऊंची इमारतें खड़ी कर दी गईं, या प्रशासन ने जानबूझकर ये रिकॉर्ड हटा दिए।
शहर पर पानी की किल्लत का संकट दिन-ब-दिन गहरा रहा है। ऐसे में पर्यावरण प्रेमी और नागरिक मांग कर रहे हैं कि प्रशासन पुराने 508 कुओं के रिकॉर्ड की मौके पर जाकर जांच करे, गायब कुओं का पता लगाए और उन्हें पाटने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करे।
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