नागपुर स्नातक चुनाव: गडकरी ने पूर्व पार्षदों की बैठक ली, सोले-व्यास की बगावत पर भाजपा सतर्क
नागपुर स्नातक चुनाव में अधिकृत उम्मीदवार सुधाकर कोहले की जीत के लिए भाजपा ने तैयारी तेज की है। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने अपने निवास पर पूर्व पार्षदों की बैठक ली।
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नागपुर स्नातक चुनाव में भाजपा के अधिकृत उम्मीदवार सुधाकर कोहले को जिताने के लिए पार्टी ने तैयारी तेज कर दी है। पूर्व विधायक अनिल सोले और गिरीश व्यास के बागी होने से अधिकृत उम्मीदवार को कितना नुकसान हो सकता है, इसका आकलन किया जा रहा है। साथ ही हर स्तर पर किलेबंदी की कवायद भी शुरू हो गई है।
इसी कड़ी में केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी खुद मैदान में उतरते दिख रहे हैं। उन्होंने अपने निवास पर भाजपा के पूर्व पार्षदों की बैठक ली। बैठक में शहर अध्यक्ष दयाशंकर तिवारी मौजूद थे। स्नातक चुनाव के सहप्रमुख गिरीश देशमुख, अर्चना डेहनकर और रमन सेनाड भी वहां थे।
रमन सेनाड ने भी बगावत करके अपनी उम्मीदवारी दाखिल की थी, लेकिन पार्टी के कहने पर उन्होंने नामांकन वापस ले लिया। अब वे इस चुनाव में सहप्रमुख की जिम्मेदारी निभा रहे हैं।
शहर में पूर्व पार्षदों की संख्या 155 बताई जाती है। बहुत कम समय में बैठक के लिए 93 से संपर्क किया जा सका। शनिवार को हुई बैठक में इनमें से 41 पूर्व पार्षद पहुंचे। सूत्रों के मुताबिक गडकरी ने सभी से पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार के साथ रहने की अपील की।
कुछ पूर्व पार्षदों ने शिकायत की कि पार्टी उन्हें साइडलाइन कर रही है और किसी भी काम में उनकी सुनवाई नहीं होती। इस पर नितिन गडकरी ने उनसे कहा कि वे सीधे उनसे ही मिलें।
अनिल सोले की बगावत और गिरीश व्यास के पार्टी छोड़कर सोले को खुला समर्थन देने की घोषणा के बाद पार्टी नेता डैमेज कंट्रोल में जुट गए हैं। इस बार भाजपा यह सीट किसी भी कीमत पर अपने पाले में करना चाहती है। पार्टी के शहर नेतृत्व ने दावा किया है कि बगावत से कोई फर्क नहीं पड़ेगा और अधिकृत उम्मीदवार की जीत होगी।
पार्टी जानती है कि स्नातक चुनाव क्षेत्र में अनिल सोले और गिरीश व्यास के काफी पुराने और अच्छे संपर्क व संबंध हैं। अनिल सोले पार्षद और मेयर तक रह चुके हैं। पूर्व पार्षदों से भी उनके गहरे संबंध हैं। ऐसे में वे भी उनसे अपने लिए समर्थन जरूर मांगेंगे।
कहा जा रहा है कि यह भांपकर ही केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी से पूर्व पार्षदों की बैठक लेकर अपील करने का निवेदन किया गया, ताकि उनके वज़न का फायदा पार्टी के उम्मीदवार को मिले।
हालांकि भाजपा में ही अनेक लोग यह पचा नहीं पा रहे हैं कि सोले और व्यास जैसे नेता पार्टी से बगावत कर सकते हैं। राजनीतिक महकमे में यह चर्चा भी है कि यह भाजपा की ही कोई छिपी रणनीति है, जिसके तहत पार्टी से नाराज युवा मतदाताओं को विकल्प मिले और वे कांग्रेस की ओर न जाएं। अगर ऐसा है भी, तो नुकसान या फायदा किसे होगा, यह 27 अक्टूबर को चुनाव परिणाम के बाद ही साफ हो पाएगा।