महायुति में आखिर किस पार्टी की हुई उपेक्षा
नागपुर.
महाराष्ट्र की सत्ता में साथ-साथ चल रही महायुति के भीतर क्या सबकुछ ठीक नहीं है? शिवसेना (एकनाथ शिंदे गुट) के नेता और पूर्व सांसद संजय निरुपम के बयान ने इस सवाल को हवा दे दी है. निरुपम ने आरोप लगाया कि उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे को कमजोर करने के लिए छिपा एजेंडा चलाया जा रहा है। उनके इस बयान से महायुति के भीतर की सियासी खींचतान चर्चा में आ गई है.
निरुपम ने कहा कि एकनाथ शिंदे ने भाजपा का साथ देकर महाराष्ट्र में महायुति की सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाई. इसके बावजूद उन्हें कमजोर करने की कोशिशें क्यों हो रही हैं? शिंदे को कमजोर करने के पीछे कौन-सा एजेंडा काम कर रहा है? उनके आरोपों ने गठबंधन की राजनीति में नए सवाल खड़े कर दिए हैं.
चुनावी हार ने खोली समन्वय की पोल!
स्नातक निर्वाचन क्षेत्र के चुनाव में मिली हार पर भी निरुपम ने गठबंधन के भीतर तालमेल की कमी को लेकर नाराजगी जताई. उन्होंने स्पष्ट कहा कि चुनाव के दौरान समन्वय का अभाव दिखाई दिया। वे खुद नागपुर जिले के प्रभारी थे, लेकिन उन्हें ही उचित तवज्जो नहीं दी गई. निरुपम ने संकेत दिया कि जब गठबंधन के सहयोगियों को ही महत्व नहीं मिलेगा और उन्हें विश्वास में नहीं लिया जाएगा, तो इसका सीधा फायदा विरोधी दलों को मिलेगा. चुनाव केवल उम्मीदवारों के दम पर नहीं जीते जाते, बल्कि सहयोगी दलों के बीच बेहतर तालमेल और सामूहिक रणनीति भी जरूरी होती है.
महायुति में बढ़ेगी सियासी हलचल?
निरुपम के बयान ने महायुति के भीतर आपसी तालमेल और सहयोगी दलों के सम्मान का मुद्दा फिर से सामने ला दिया है. एक ओर शिंदे की भूमिका को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं, तो दूसरी ओर चुनावी हार के बाद गठबंधन की रणनीति पर भी उंगलियां उठ रही हैं. अब सवाल यह है कि निरुपम के आरोपों पर महायुति के नेता क्या जवाब देते हैं और क्या गठबंधन के भीतर समन्वय की कमी दूर करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाएगा.
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