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विकसित भारत की राह में छुट्टियां नहीं, सरकारी दफ्तरों की सुस्ती बड़ी रुकावट: संजय अग्रवाल

विकसित भारत की राह में छुट्टियां नहीं, सरकारी दफ्तरों की सुस्ती बड़ी रुकावट: संजय अग्रवाल तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

सामाजिक चिंतक संजय अग्रवाल के विश्लेषण में सरकारी कामकाज की संस्कृति, छुट्टियों और नागरिकों की शिकायतों पर सवाल उठाए गए हैं।

नागपुर: भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने और विकसित देश का लक्ष्य पाने की तरफ बढ़ रहा है। देश के पास युवा कामगार, हुनर, संसाधन और उद्यमशीलता है। लेकिन क्या प्रशासनिक व्यवस्था भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ रही है? क्या सरकारी दफ्तरों में काम की गति, जवाबदेही और उत्पादकता देश की आर्थिक महत्वाकांक्षा से मेल खाती है?

सामाजिक चिंतक संजय अग्रवाल ने अपने विश्लेषण में सरकारी कामकाज की संस्कृति, छुट्टियों की व्यवस्था, नागरिकों की शिकायतों और प्रशासनिक जवाबदेही पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि दिक्कत सिर्फ छुट्टियों की गिनती में नहीं है। असली मुद्दा यह है कि मौजूद कामकाजी दिनों का कितना असरदार इस्तेमाल होता है और जनता की सेवाएं समय पर देने की जिम्मेदारी कितनी निभाई जाती है।

उनके मुताबिक एक तरफ किसान हैं, जिन्हें मौसम, कर्ज और बाजार की अनिश्चितता झेलनी पड़ती है। मजदूरों को रोजी-रोटी के लिए रोज काम करना पड़ता है। प्राइवेट सेक्टर के कर्मचारियों पर टारगेट पूरा करने का दबाव रहता है और व्यापारी हर दिन होड़ का सामना करते हैं। दूसरी तरफ सरकारी सेवाओं में देरी, अटकी फाइलों, अफसरों के न मिलने और दफ्तरों के बार-बार चक्कर लगाने की शिकायतें आती रहती हैं।

अग्रवाल के अनुसार यह सिर्फ काम करने के तरीके का फर्क नहीं है। इसका सीधा असर नागरिकों के समय, कारोबार की लागत, निवेश के माहौल और आर्थिक उत्पादकता पर पड़ता है। साथ ही वे मानते हैं कि सभी सरकारी कर्मचारियों को एक ही नजर से देखना ठीक नहीं होगा। बहुत से कर्मचारी मुश्किल हालात में पूरी लगन से काम करते हैं। दिक्कत व्यवस्था की खामियों और लापरवाही की है, जिसकी वजह से नागरिकों को समय पर सेवा नहीं मिल पाती।

छुट्टियों के गणित पर उन्होंने बताया कि केंद्र सरकार के सामान्य प्रशासनिक दफ्तर शनिवार और रविवार की साप्ताहिक छुट्टी की वजह से साल में 104 दिन बंद रहते हैं। इसके अलावा 2026 के लिए दिल्ली के केंद्र सरकार के दफ्तरों में 17 राजपत्रित छुट्टियां घोषित की गई हैं। उनका कहना है कि इन दोनों आंकड़ों को सीधे जोड़कर कुल छुट्टियां बताना सही नहीं होगा, क्योंकि कुछ राजपत्रित छुट्टियां शनिवार या रविवार को पड़ सकती हैं। राज्यों और विभागों में छुट्टियों की सूची भी अलग-अलग होती है।

भारत जैसे विविधता वाले देश में त्योहारों और धार्मिक मौकों का सामाजिक महत्व है, इसलिए अग्रवाल के मुताबिक छुट्टियां खत्म करना हल नहीं है। असली सवाल यह है कि उपलब्ध कामकाजी दिनों में कितना काम समय पर पूरा होता है। अगर दफ्तर समय पर नहीं खुलते, फाइलें आगे नहीं बढ़तीं, फैसलों में बेवजह देरी होती है और नागरिकों को बार-बार बुलाया जाता है, तो अतिरिक्त कामकाजी दिन भी वांछित नतीजे नहीं देंगे। उनका कहना है कि जनता के टैक्स से चलने वाली व्यवस्था को लोगों के समय और मेहनत की कीमत समझनी चाहिए।

जवाबदेही पर अग्रवाल कहते हैं कि प्राइवेट सेक्टर में काम की गुणवत्ता, डेडलाइन और परफॉर्मेंस की आमतौर पर नियमित समीक्षा होती है। सरकारी व्यवस्था में भी मूल्यांकन और अनुशासन के नियम हैं, लेकिन नागरिक के लिए यह जानना हमेशा आसान नहीं होता कि कौन सा अफसर उसकी अर्जी रोके बैठा है या देरी के लिए कौन जिम्मेदार है। सर्टिफिकेट के लिए हफ्तों इंतजार करना, पेंशन के काम के लिए बुजुर्गों को बार-बार दफ्तर बुलाना या किसान को समय पर मदद न मिलना सिर्फ प्रशासनिक असुविधा नहीं है। इसका असर लोगों के पैसे, समय और मौकों पर भी पड़ता है। उनके शब्दों में, समय पर दफ्तर पहुंचना, फाइलों पर फैसला लेना और तय समय में सेवा देना कोई एहसान नहीं, सार्वजनिक पद की बुनियादी जिम्मेदारी है। कर्मचारी संगठनों से भी उनकी अपेक्षा है कि कर्मचारियों के अधिकार, उचित वेतन, पर्याप्त स्टाफ और बेहतर कामकाजी हालात की मांग के साथ वे कार्यक्षमता, अनुशासन और नागरिक सेवाओं की गुणवत्ता पर भी जोर दें।

अग्रवाल ने कुछ आंकड़े भी रखे। उनके मुताबिक केंद्रीकृत लोक शिकायत निवारण और निगरानी प्रणाली (CPGRAMS) पर 2021 से फरवरी 2026 तक कुल 11,189,384 शिकायतें दर्ज होने की जानकारी है। अकेले 2025 में 2,278,256 शिकायतें दर्ज हुईं। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 2025 में केंद्रीय मंत्रालयों में शिकायतों के निपटारे का औसत समय 15 दिन रहा और 82.1 प्रतिशत शिकायतें 21 दिन के भीतर निपटाई गईं। वे कहते हैं कि इन्हें सिर्फ प्रशासनिक नाकामी का सबूत नहीं माना जा सकता, क्योंकि सेवाओं तक डिजिटल पहुंच बेहतर होने और शिकायत दर्ज करने को लेकर बढ़ी जागरूकता से भी संख्या बढ़ी हो सकती है। फिर भी शिकायतों की इतनी बड़ी तादाद सेवा की गुणवत्ता, शिकायतों की प्रकृति और बार-बार आने वाली समस्याओं की समीक्षा की जरूरत बताती है।

सरकारी शिक्षकों की गैरहाजिरी पर उन्होंने अमेरिका के नेशनल ब्यूरो ऑफ इकोनॉमिक रिसर्च (NBER) के 2014 के एक अध्ययन का हवाला दिया। उसमें भारत के सरकारी शिक्षकों की बिना अनुमति गैरहाजिरी पर सालाना वेतन खर्च का अनुमान करीब 1.5 अरब डॉलर लगाया गया था। अग्रवाल ने साफ किया कि यह 2014 के अध्ययन पर आधारित अनुमान है, 2026 के नुकसान का असली आंकड़ा नहीं। अध्ययन में निगरानी बढ़ने से शिक्षकों की गैरहाजिरी घटने के संकेत भी मिले थे। उनके मुताबिक इसका महत्व सरकारी वेतन के बेहतर इस्तेमाल से आगे जाता है, क्योंकि शिक्षक की गैरहाजिरी का असर बच्चों की पढ़ाई, पाठ्यक्रम की निरंतरता और खासकर गरीब परिवारों के बच्चों के शैक्षणिक मौकों पर पड़ता है।

जीडीपी के संदर्भ में उन्होंने PRS Legislative Research की अप्रैल 2026 की समीक्षा का जिक्र किया, जिसमें 2025-26 की नॉमिनल जीडीपी का अनुमान करीब 345 लाख करोड़ रुपये लगाया गया है। इसके आधार पर उन्होंने गणित के उदाहरण दिए: 0.1 प्रतिशत यानी 34,500 करोड़ रुपये, 0.5 प्रतिशत यानी 1,72,500 करोड़ रुपये और 1 प्रतिशत यानी 3,45,000 करोड़ रुपये। अग्रवाल का कहना है कि ये जीडीपी के प्रतिशत के गणितीय उदाहरण हैं, सरकारी लापरवाही से हुआ असली नुकसान नहीं। प्रशासनिक देरी और कम उत्पादकता का असली आर्थिक असर जानने के लिए अलग और व्यवस्थित अध्ययन की जरूरत होगी। फिर भी इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था में उत्पादकता में छोटी बढ़ोतरी का भी व्यापक आर्थिक महत्व है। उनके मुताबिक सरकार को अटकी मंजूरियों, देर से मिलती सेवाओं और प्रशासनिक रुकावटों की लागत का अध्ययन कर उसी हिसाब से सुधारों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

अग्रवाल का मानना है कि छुट्टियों से बड़ी समस्या काम टालने की मानसिकता है। छुट्टी लेना कर्मचारी की गलती नहीं है, क्योंकि कानूनी और मंजूर छुट्टियां कर्मचारियों का अधिकार हैं। दिक्कत तब होती है जब छुट्टी से पहले जानबूझकर फाइलें रोकी जाएं, दफ्तर खुलने के बाद भी लंबित मामले न निपटें या मामूली कमी के लिए नागरिकों को हफ्तों इंतजार कराया जाए। सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें होता है जिनकी रोजी रोज के काम पर टिकी है। दिहाड़ी मजदूर की एक दिन की मजदूरी जाती है, छोटे व्यापारी का धंधा प्रभावित होता है और जरूरी काम समय पर न होने से किसान को नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए प्रशासनिक सुधार का लक्ष्य सिर्फ दफ्तर में हाजिरी दर्ज करना नहीं, बल्कि नागरिकों को समय पर और अच्छी सेवा देना होना चाहिए।

चुनाव, बाढ़, कानून-व्यवस्था की स्थिति और कर्मचारियों के आंदोलन से भी प्रशासनिक काम पर असर पड़ सकता है। अग्रवाल के मुताबिक चुनाव लोकतंत्र के लिए जरूरी हैं और आपदा में राहत व बचाव कार्य को सबसे ऊंची प्राथमिकता मिलनी चाहिए। फिर भी ऐसे हालात में जरूरी नागरिक सेवाएं यथासंभव चालू रखने का इंतजाम होना चाहिए। यह वैकल्पिक स्टाफ की तैनाती, ऑनलाइन अर्जी, अधिकृत अफसरों के बीच काम के हस्तांतरण और जरूरी सेवाओं की निरंतरता की साफ योजना से हो सकता है। उनका कहना है कि मकसद कर्मचारियों के अधिकार सीमित करना नहीं, बल्कि यह पक्का करना है कि नागरिक किसी भी हालत में पूरी तरह बेसहारा न रह जाएं।

प्रशासनिक सुधार के लिए अग्रवाल ने आठ जरूरी कदम सुझाए हैं। पहला, बायोमेट्रिक हाजिरी के साथ यह भी परखा जाए कि तय समय में कितना काम हुआ और उसकी गुणवत्ता कैसी रही। दूसरा, सर्टिफिकेट, पेंशन, लाइसेंस और दूसरी सेवाओं की साफ समय-सीमा तय हो, देरी होने पर कारण दर्ज किया जाए और लापरवाही पर नियमों के मुताबिक कार्रवाई हो। तीसरा, सालाना मूल्यांकन में लंबित मामलों, समय पर निपटारे, काम की गुणवत्ता और नागरिकों की राय को उचित महत्व मिले। चौथा, बार-बार बिना अनुमति गैरहाजिर रहने, जानबूझकर फाइलें रोकने और भ्रष्टाचार की निष्पक्ष जांच हो और नियमों के तहत कार्रवाई हो, जिसमें संबंधित कर्मचारी को अपनी बात रखने का मौका भी मिले।

पांचवां, समय पर और अच्छा काम करने वाले कर्मचारियों को पहचान, ट्रेनिंग और तरक्की के मौके मिलें। छठा, अर्जी, भुगतान और फाइल की स्थिति ऑनलाइन उपलब्ध हो और अफसर की गैरहाजिरी में काम किसी अधिकृत वैकल्पिक अफसर को सौंपने की व्यवस्था हो। सातवां, छुट्टियों की व्यवस्था की समय-समय पर समीक्षा हो और जरूरत पड़ने पर बारी-बारी की व्यवस्था से जरूरी सेवाएं चालू रहें, और यह सब कर्मचारियों के कानूनी अधिकारों का सम्मान करते हुए हो। आठवां, हर विभाग की सालाना रिपोर्ट में मिली, निपटाई गई और लंबित अर्जियों की संख्या, निपटारे का औसत समय और देरी की मुख्य वजहें सार्वजनिक की जाएं।

अग्रवाल के अनुसार भारत को विकसित बनाने की जिम्मेदारी सिर्फ उद्योगों, किसानों, उद्यमियों और प्राइवेट सेक्टर पर नहीं है। सरकारी संस्थाओं की कार्यक्षमता भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि नीतियों को जमीन पर उतारने, नागरिकों तक सेवाएं पहुंचाने और आर्थिक गतिविधि को आगे बढ़ाने में प्रशासन की केंद्रीय भूमिका है। उनका कहना है कि सरकारी कर्मचारियों की आलोचना का मकसद उनका अपमान नहीं होना चाहिए। पर्याप्त स्टाफ, बेहतर ट्रेनिंग, आधुनिक तकनीक और जरूरी संसाधनों के बिना बेहतर नतीजों की उम्मीद करना भी ठीक नहीं है। सुधार की जिम्मेदारी सरकार, प्रशासनिक नेतृत्व और कर्मचारियों, तीनों की है।

उन्होंने कहा कि जनता के पैसे से चलने वाली व्यवस्था को जनहित में नतीजे देने होंगे। जैसे कर्मचारियों को समय पर वेतन और नौकरी की सुरक्षा मिलनी चाहिए, वैसे ही नागरिकों को तय समय में सेवा मिलनी चाहिए। उनके शब्दों में, "छुट्टी अधिकार है, लेकिन लापरवाही अधिकार नहीं है।" उनके मुताबिक विकसित भारत का लक्ष्य तभी सार्थक होगा जब प्रशासन में हाजिरी के साथ उत्पादकता, पद के साथ जिम्मेदारी और वेतन के साथ जवाबदेही जुड़ी होगी। यह विश्लेषण सामाजिक चिंतक संजय अग्रवाल का है।

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