मध्य रेल्वे की पॉइंट्समन रूपाली खरे: पति के जाने के बाद तीन बच्चों के लिए 14 साल की नौकरी
पति के निधन के बाद अनुकंपा पर रेलवे में आईं रूपाली खरे ने तीन बच्चों को अकेले पाला। पॉइंट्समन के तौर पर वे हादसों के बाद शवों के अवशेष इकट्ठा करने का काम भी कर चुकी हैं।
आधी रात का वक्त, चारों तरफ अंधेरा और रेल की पटरियों पर हादसे के बाद बिखरे पड़े शवों के अवशेष। ऐसा मंजर देखकर बहुतों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं। लेकिन मध्य रेलवे में एक महिला ऐसे हालात में भी डरे बिना अपना फर्ज निभाती आई हैं। रेल हादसे के बाद शवों के अवशेष इकट्ठा करने जैसी बेहद मुश्किल जिम्मेदारी भी उन्होंने हिम्मत से उठाई। ये हैं मध्य रेलवे की पॉइंट्समन रूपाली सिद्धार्थ खरे।
पति के असमय निधन के बाद तीन छोटे बच्चों की जिम्मेदारी संभालते हुए रूपाली खरे को रेलवे की सेवा में 14 साल हो चुके हैं। शारदीय नवरात्रोत्सव के सातवें दिन उन्होंने रेलवे के मुश्किल काम, जिंदगी में आई मुसीबत, बच्चों के लिए की गई जद्दोजहद और कठिन हालात में भी न टूटने की जिद के बारे में खुलकर बात की।
रूपाली की जिंदगी का संघर्ष पति के अचानक चले जाने से शुरू हुआ। करीब 16 साल पहले दिल का दौरा पड़ने से उनके पति का निधन हो गया। इस अनहोनी ने उन्हें बड़ा झटका दिया। घर का सहारा अचानक छिन गया और तीन छोटे बच्चों को पालने की पूरी जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। उस वक्त रूपाली की उम्र सिर्फ 20 से 22 साल थी। इतनी कम उम्र में पति के जाने का गम, बच्चों का भविष्य और घर का खर्च चलाने का सवाल, सब एक साथ उनके सामने खड़ा था।
फिर भी उन्होंने हालात के आगे हार नहीं मानी और खुद को संभाला। रेलवे की तरफ से अनुकंपा के आधार पर नौकरी का मौका मिला तो उन्होंने उसे स्वीकार कर लिया। बच्चों को अच्छी पढ़ाई करानी है, उनका भविष्य बनाना है और परिवार को फिर से खड़ा करना है, इसी इरादे से उन्होंने रेलवे में कदम रखा।
रेलवे की नौकरी की शुरुआत मुंबई के बेहद भीड़ वाले दादर स्टेशन से हुई। दादर मध्य और पश्चिम रेलवे का अहम स्टेशन है, इसलिए यहां दिन भर यात्रियों की बड़ी आवाजाही रहती है। लगातार दौड़ती लोकल, यात्रियों की भीड़, ट्रेनों के संचालन से जुड़ी जिम्मेदारियां और अचानक आ पड़ने वाले आपातकालीन हालात, ऐसे माहौल में काम करना आसान नहीं होता।
रूपाली ने शुरू से ही भरोसे के साथ काम किया। हादसा हो, गाड़ी रुकने की नौबत हो या स्टेशन पर कोई विवाद खड़ा हो जाए, उन्होंने कभी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ा। अपने फर्ज के बारे में वे कहती हैं, 'मैंने कभी डर कर नौकरी नहीं की। कोई भी हालात हों, आगे जाकर काम किया।' दादर स्टेशन के तजुर्बों ने उन्हें और मजबूत बनाया। इसके बाद माटुंगा स्टेशन को महिलाओं के संचालन वाले 'पिंक स्टेशन' के रूप में विकसित किया गया तो उनका तबादला वहां हो गया।
रेलवे में पॉइंट्समन का काम सिर्फ गाड़ियों के संचालन तक सीमित नहीं है। कुछ हालात में उन्हें बेहद कठिन मौकों का भी सामना करना पड़ता है। पटरियों पर हादसा होने के बाद जो हालात बनते हैं, वे मन को बेचैन करने वाले होते हैं। ऐसे में संबंधित महकमों के तालमेल से जरूरी काम निपटाने पड़ते हैं। रूपाली खरे ने बताया कि ऐसे मौकों पर उन्होंने शवों के अवशेष इकट्ठा करने जैसी मुश्किल जिम्मेदारी भी निभाई। मौत का भयावह मंजर सामने होने पर भी उन्होंने मन कड़ा करके अपना काम किया।
रूपाली मूल रूप से पुणे की रहने वाली हैं। नौकरी के लिए उन्हें अक्सर पुणे से मुंबई का लंबा सफर करना पड़ता है। सुबह रेल से पुणे से मुंबई पहुंचना, फिर शाम से अगली सुबह तक ड्यूटी करना और दोबारा पुणे की तरफ लौटना, यही उनकी दिनचर्या है। रेलवे का काम शारीरिक और मानसिक तौर पर थकाने वाला है, ऊपर से लंबे सफर की थकान भी रहती है। फिर भी परिवार की जिम्मेदारी और काम के प्रति लगन की वजह से वे अपना फर्ज निभा रही हैं। कुछ बार वे मुंबई के मालाड में मौसी के यहां रहकर भी ड्यूटी करती हैं। सफर, नौकरी और घर की जिम्मेदारियों में तालमेल बैठाने के लिए उन्हें लगातार जूझना पड़ता है।
रूपाली की दो बेटियां और एक बेटा है। बड़ी बेटी ऊंची पढ़ाई कर रही है, दूसरी बेटी बारहवीं में है और बेटा दसवीं में पढ़ता है। पति के निधन के बाद इन तीनों की परवरिश और पढ़ाई की जिम्मेदारी उन्होंने अकेले उठाई। बच्चों को भी मां के इस संघर्ष का एहसास है। रूपाली बताती हैं कि बच्चों को अपनी मां पर गर्व है। 'मम्मी, तूने हमारे लिए बहुत मेहनत की। हम बड़े हो जाएंगे तो तुझे आराम देंगे,' बच्चों के ये शब्द सुनकर उन्हें नई ताकत मिलती है। बच्चों का प्यार, भरोसा और उन्हें काबिल बनाने का सपना ही उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी प्रेरणा रहा है।
रेलवे की सेवा के इन 14 सालों में रूपाली खरे ने कई मुश्किल मौकों का सामना करते हुए अपनी जिम्मेदारी निभाई है। उनके साहसी और फर्ज के प्रति समर्पित काम को देखते हुए मंडल रेल प्रबंधक (डीआरएम) की तरफ से उनका सम्मान किया गया है। रेलवे के काम में कई कठिन घड़ियां देखकर भी उन्होंने अपनी जिद नहीं छोड़ी।
अपने संघर्ष की बात करते हुए रूपाली ने इंसानियत की अहमियत पर भी जोर दिया। उनका संदेश है, 'इंसानियत सबसे बड़ी चीज है। किसी को परेशानी आए तो मदद के लिए दौड़ पड़ो। वह रेलवे का हो या बाहर का, लेकिन इंसान के नाते एक-दूसरे का साथ देना जरूरी है।' खुद कई मुसीबतें झेलने के बाद भी उन्होंने दूसरों की मदद का जज्बा बनाए रखा है।
रूपाली खरे ने अपनी निजी जिंदगी के संघर्ष के साथ रेलवे के काम के अनुभव भी साझा किए। पति के जाने के बाद टूटे बिना तीन बच्चों को पालने वाली मां, कठिन मौकों पर हिम्मत से काम करने वाली रेलवे कर्मचारी और इंसानियत का संदेश देने वाली संवेदनशील महिला, इस बातचीत में उनके कई रूप दिखे।
मुंबई की लोकल लाखों यात्रियों की जिंदगी का हिस्सा है। लेकिन इस व्यवस्था को चालू रखने के लिए पर्दे के पीछे काम करने वाले कर्मचारियों का योगदान अक्सर नजरअंदाज रह जाता है। रूपाली सिद्धार्थ खरे जैसी महिलाएं इस व्यवस्था का अहम हिस्सा हैं। पति का असमय निधन, तीन बच्चों की जिम्मेदारी, रेलवे की मुश्किल ड्यूटी और पुणे-मुंबई का थका देने वाला सफर, इन सब पर काबू पाकर वे आगे बढ़ती रही हैं।