कुडवा जैवविविधता उद्यान: फंड मंजूर होने से पहले ही निकाला गया टेंडर, उठे सवाल
गोंदिया शहर से सटे कुडवा के जैवविविधता उद्यान के कामों में अचानक आई तेजी और टेंडर प्रक्रिया पर स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
गोंदिया शहर से सटे कुडवा के जैवविविधता उद्यान के विकासकामों को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। प्रशासनिक हलकों में इसकी खूब चर्चा है। कई साल से यह उद्यान बेहद धीमी रफ्तार और अनदेखी का शिकार रहा, लेकिन अब इसके कामों ने अचानक 'बुलेट ट्रेन' की रफ्तार पकड़ ली है। इससे स्थानीय नागरिक हैरान हैं और उनके मन में गहरा शक पैदा हो गया है।
मिली जानकारी के मुताबिक, इस साल 25 फरवरी को एक ऐसे अखबार में टेंडर का विज्ञापन छपा, जो बहुत कम लोगों तक पहुंचता है। उसमें कुल 20 विकासकामों के टेंडर थे और उनमें से 15 काम अकेले कुडवा के जैवविविधता उद्यान से जुड़े थे। हैरानी की बात यह है कि विज्ञापन में यह कहीं नहीं बताया गया था कि इन कामों के लिए फंड कहां से मंजूर हुआ है या ये काम किस योजना के तहत हो रहे हैं।
इसके करीब 5 महीने बाद, यानी 23 जुलाई को जारी शासन निर्णय (GR) के तहत राज्य योजना से कुडवा उद्यान के लिए 2.00 करोड़ रुपये का फंड आधिकारिक तौर पर मिला। इसी वजह से सीधा और गंभीर सवाल उठ रहा है कि सरकारी फंड की औपचारिक मंजूरी मिलने से पहले ही वन विभाग ने फरवरी में टेंडर प्रक्रिया कैसे चला दी।
स्थानीय लोगों में यह चर्चा भी जोरों पर है कि कोरोना महामारी से पहले ही इस उद्यान के ज्यादातर काम सामाजिक वनीकरण विभाग पूरे कर चुका था। ऐसे में शक गहरा रहा है कि अब नए मिले फंड से वही पुराने काम कागजों पर नए दिखाकर पैसा हड़पने की कोशिश तो नहीं हो रही।
टेंडर की पारदर्शिता पर भी बड़ा सवालिया निशान लगा है। गोंदिया जिले में ऑफलाइन तरीके से निकाले गए इस टेंडर में गोंदिया के किसी भी स्थानीय ठेकेदार को काम नहीं मिला। इसके बजाय पड़ोसी गडचिरोली जिले के वडसा के एक ठेकेदार को यह काम दिया गया। आरोप है कि ऑफलाइन टेंडर के नाम पर एक खास ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के लिए यह सारी कवायद की गई।
कई साल तक उद्यान का काम इतना सुस्त चलता रहा कि स्थानीय पर्यावरण प्रेमियों और नागरिकों ने इसे 'कछुए की चाल की आदर्श मिसाल' कहकर ताना मारा था। उद्यान में डाली गई मिट्टी और ईंटें सालों एक ही जगह पड़ी रहीं। जिन छोटे बच्चों के सामने उद्यान की घोषणा हुई थी, वे बड़े होकर शादी की उम्र तक पहुंच गए, फिर भी काम पूरा नहीं हुआ था।
लेकिन पिछले कुछ दिनों से उद्यान की किस्मत अचानक पलट गई है। रात के अंधेरे में बड़े-बड़े फ्लड लाइट लगाकर सीमेंट कंक्रीट का काम निपटाया जा रहा है। सूखे पेड़ों की जगह रातों-रात बना-बनाया नकली लॉन लाकर बिछाया जा रहा है और बेंचों पर जमी धूल की परत के ऊपर गीले रंग के सूखने से पहले ही दूसरा रंग फेरा जा रहा है।
इस अचानक आई तेजी के पीछे का राज टटोलने पर बेहद चौंकाने वाली जानकारी सामने आ रही है। चर्चा है कि पूरे विकासकाम की बागडोर सीधे या परोक्ष रूप से वन विभाग के अधिकारियों के हाथ में है और वे खुद ही ठेकेदार के तौर पर काम देख रहे हैं। 'रक्षक ही भक्षक' बनने की इस बात से नागरिकों में भारी गुस्सा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि रात के अंधेरे में जल्दबाजी में निपटाए जा रहे कामों से भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है। घटिया सामान लगाकर सरकारी फंड को खुलेआम ठिकाने लगाए जाने की तस्वीर दिख रही है।
इस सबसे नाराज इलाके के एक जागरूक नागरिक ने पूरे गड़बड़झाले की गहरी जांच की मांग करते हुए संबंधित उच्च स्तरीय प्रशासनिक व्यवस्था के पास आधिकारिक शिकायत दर्ज कराई है। इस शिकायत से प्रशासन में हड़कंप है और उम्मीद जताई जा रही है कि 'बुलेट ट्रेन' रफ्तार के पीछे के भ्रष्टाचार का सच जल्द सामने आएगा।