रविवार, 8 नवंबर 2026

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कन्हालगांव अभयारण्य प्रस्ताव पर 47 गांवों का विरोध, मुनगंटीवार करेंगे मुख्यमंत्री से बात

कन्हालगांव अभयारण्य प्रस्ताव पर 47 गांवों का विरोध, मुनगंटीवार करेंगे मुख्यमंत्री से बात तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
सियासत PT24 टीम

प्रस्तावित कन्हालगांव अभयारण्य के खिलाफ 47 गांवों के लोग और सरपंच संगठन खड़े हैं। विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने वन विभाग के अधिकारियों से बैठक की और मामला मुख्यमंत्री तक ले जाने की बात कही।

चंद्रपुर जिले के प्रस्तावित कन्हालगांव अभयारण्य को लेकर 47 गांवों के लोगों और सरपंच संगठन ने विरोध दर्ज कराया है। इसी विरोध को देखते हुए विधायक सुधीर मुनगंटीवार ने वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक की और स्थानीय लोगों के सवाल उठाए।

प्रस्तावित क्षेत्र करीब 25,138 हेक्टेयर का है, यानी 25138.146 हेक्टेयर। इससे जुड़े 47 गांवों में गोंडपिपरी तालुका के 39, पोंभुर्णा तालुका के 5 और बल्लारपुर तालुका के 3 गांव शामिल हैं। इस इलाके के बड़े वन क्षेत्र का कब्जा फिलहाल वन विकास महामंडल के पास है और उसके जरिए हजारों स्थानीय लोगों को रोजगार मिलता है।

ग्रामीणों ने डर जताया है कि अभयारण्य बनने के बाद कोर और बफर क्षेत्र के गांवों पर कई तरह की पाबंदियां लग सकती हैं। उन्हें यह भी आशंका है कि जंगल पर टिके रोजगार घटेंगे और पारंपरिक आजीविका पर असर पड़ेगा। आदिवासी भाइयों की पारंपरिक जीवनशैली और जंगल से उनके रिश्ते पर पड़ने वाले असर की चिंता भी बैठक में रखी गई।

बैठक में यह मुद्दा भी उठा कि ताडोबा-अंधारी व्याघ्र प्रकल्प के आसपास बसाए गए गांवों के लोग आज भी कई समस्याओं से जूझ रहे हैं। इसलिए ग्रामीणों का रुख यह है कि नए अभयारण्य की वजह से उन्हें फिर विस्थापन, पाबंदियों और रोजगार के सवालों का सामना न करना पड़े। यह सवाल भी पूछा गया कि जब चंद्रपुर जिले में ताडोबा-अंधारी व्याघ्र प्रकल्प के जरिए बाघ संरक्षण का बड़ा काम चल रहा है, तो एक और अभयारण्य की जरूरत क्या है।

मुनगंटीवार ने इस मामले का एक और गंभीर पहलू बताते हुए जिले में बाघों के हमलों से होने वाली इंसानी मौतों का मुद्दा रखा। उनके मुताबिक वन्यजीव संरक्षण के साथ जंगल के पास रहने वाले लोगों की जान की हिफाजत और सुरक्षा की गारंटी देना भी उतना ही जरूरी है। उन्होंने कहा कि संरक्षण की नीति में स्थानीय जनता के हित को केंद्र में रखना चाहिए। स्थानीय लोगों को डर है कि अभयारण्य से वन्यजीवों और इंसानी बस्तियों के बीच टकराव बढ़ेगा।

पूर्व वन मंत्री मुनगंटीवार ने साफ कहा कि स्थानीय लोगों की इच्छा के खिलाफ कोई फैसला थोपने नहीं दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वे वन मंत्री थे, तब उन्होंने कन्हालगांव अभयारण्य का प्रस्ताव रोक दिया था। अब ग्रामीणों और सरपंच संगठन का विरोध फिर सामने आया है, तो वे मजबूती से उनके साथ खड़े रहेंगे। उनका कहना था कि मंत्रालय में बैठकर गांव वालों की दिक्कतों की गंभीरता नहीं समझी जा सकती, इसके लिए गांव में जाकर उनसे बात करनी होगी। ग्रामीणों को भरोसे में लिए बिना प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ना चाहिए, और इसके लिए वे मामला मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस समेत सरकार के सर्वोच्च स्तर तक ले जाएंगे। प्रस्ताव रद्द कराने के लिए वे हर संभव कोशिश करेंगे।

आगे की कार्रवाई के लिए उन्होंने कुछ सुझाव दिए। पहला, मुख्यमंत्री फडणवीस के साथ 18, 19 या 20 नवंबर को बैठक का समय तय किया जाए। दूसरा, वन मंत्री गणेश नाईक और वन विभाग के सचिवों के साथ विस्तार से चर्चा कराई जाए। तीसरा, कन्हालगांव अभयारण्य को लेकर हुई सभी प्रशासनिक कार्रवाइयों की जानकारी उपलब्ध कराई जाए। उन्होंने यह भी कहा कि नागपुर या चंद्रपुर में वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों, सरपंच संगठन के प्रतिनिधियों और स्थानीय नागरिकों की संयुक्त बैठक हो, ताकि सभी पक्ष सुने जा सकें।

सरपंच संगठन के अध्यक्ष देविदास सातपुते ने ग्रामीणों का पक्ष रखा। उन्होंने कहा कि सभी सरपंच और गांव वाले इस मुद्दे पर एकजुट हैं। उनकी अपेक्षा है कि स्थानीय लोगों के साथ अन्याय न हो और उनके अधिकार सुरक्षित रहें, इसके लिए मुनगंटीवार पहल करके सरकार के सामने उनकी बात रखें।

बैठक में वन विकास महामंडल के प्रबंध निदेशक एम. श्रीनिवास राव, क्षेत्रीय प्रबंधक दिव्याभारती एम. और ताडोबा-अंधारी व्याघ्र प्रकल्प के क्षेत्र निदेशक प्रभुनाथ शुक्ला मौजूद थे। इनके अलावा कई गांवों के सरपंच, नागरिक और वन विभाग के अधिकारी भी शामिल हुए।

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