इराक और सीरिया के रास्ते गए इज़रायली जेट आखिरी वक्त पर लौटाए गए, अमेरिकी दबाव के संकेत
इज़रायली हवाई दल के लड़ाकू विमान इराण की सीमा के पास पहुंचकर अचानक वापस बुला लिए गए। सेना इसे 'नियमित अभ्यास' बता रही है।
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मध्य पूर्व में माहौल एक बार फिर बेहद तनावपूर्ण और विस्फोटक मोड़ पर पहुंच गया है। इज़रायल में जल्द होने वाले चुनावों के बीच प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के एक फैसले ने पूरी दुनिया की सांसें थाम दी थीं। इराण के साथ सीधी जंग छेड़नी है या आने वाले चुनावों पर ध्यान देना है, इस सवाल पर इज़रायल के सियासी हलकों और इज़रायली रक्षा बल (IDF) के भीतर गहरे मतभेद उभर आए हैं। ऐसे नाज़ुक वक्त में नेतन्याहू ने इराण की सीमा के पास तैनात दर्जन भर लड़ाकू विमानों को अचानक वापस बुला लिया, जिसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तरह-तरह की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
मिली जानकारी के मुताबिक इज़रायली हवाई दल के इन लड़ाकू विमानों ने सीरिया और इराक के रास्ते करीब 1,300 किलोमीटर का सफर तय करके इराण की सीमा के पास दस्तक दी थी। ये विमान इराण की किसी भी संभावित जवाबी कार्रवाई का सामना करने के लिए तैयार थे। लेकिन बिल्कुल आखिरी लम्हे में इज़रायल के वरिष्ठ नेतृत्व की तरफ से इन्हें लौटने का आदेश दे दिया गया। सेना ने बाद में इस मिशन को 'नियमित सराव' बताया, मगर साफ राजनीतिक और सैन्य संकेत मिल रहे हैं कि यह फैसला अमेरिका के दबाव में लिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम में अमेरिका की कूटनीतिक भूमिका अहम रही है। जिस दिन इज़रायली विमानों ने इराण की सीमा के पास उड़ान भरी, उसी दिन अमेरिका के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने ओव्दा हवाई अड्डे पर जाकर इज़रायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू से गुपचुप मुलाकात की। बताया जा रहा है कि इस मुलाकात के दौरान और उसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सीधे दखल देते हुए नेतन्याहू को साफ सलाह दी कि इराण पर कोई भी जल्दबाज़ी वाला सैन्य हमला न किया जाए।
अमेरिका को इस वक्त मध्य पूर्व में नई जंग भड़कना बिल्कुल रास नहीं आएगा। इसी तनाव के बीच अमेरिका ने सऊदी अरब में अपनी कूटनीतिक और सैन्य सुरक्षा की समीक्षा शुरू कर दी है। संभावित क्षेत्रीय युद्ध के खतरे और यमन के हौथी बागियों के संभावित हमलों को देखते हुए अमेरिकी विदेश विभाग ने सऊदी अरब में गैर-ज़रूरी कर्मचारियों और उनके परिवारों को फौरन स्वदेश लौटने का आदेश दिया है।
नेतन्याहू के इतना आक्रामक रुख अपनाने की मुख्य वजह इराण के परमाणु कार्यक्रम की बढ़ती रफ्तार को माना जा रहा है। इस महीने की शुरुआत में ट्रम्प के साथ हुई बैठक में नेतन्याहू ने इज़रायली खुफिया एजेंसियों की रिपोर्ट का हवाला दिया था। इज़रायली खुफिया एजेंसियों को संकेत मिले हैं कि इराण अपना ठप पड़ा परमाणु कार्यक्रम फिर तेज़ी से आगे बढ़ा रहा है और एटम बम बनाने के बेहद करीब पहुंच गया है।
नेतन्याहू के मुताबिक इराण की सत्ता और सुरक्षा एजेंसियां अब सुरक्षा के सारे नियम ताक पर रखकर खतरनाक फैसले ले रही हैं। उनका कहना है कि इराण को परमाणु विज्ञान और हथियारों के मामले में आत्मनिर्भर होने से रोकना इज़रायल के वजूद का सवाल है। इसीलिए इराण की हुकूमत को उखाड़ फेंकना या उसके परमाणु ठिकानों पर सीधा स्ट्राइक करना ही एकमात्र रास्ता है, यह राय नेतन्याहू ने इज़रायली सेना (IDF), मोसाद और दूसरी सुरक्षा एजेंसियों के सामने रखी थी।
इज़रायल के आने वाले चुनाव और घरेलू सियासत इस पूरे समीकरण को और पेचीदा बना रहे हैं। एक तरफ नेतन्याहू और उनका मंत्रिमंडल इराण पर सख्त कार्रवाई करके खुद को देशभक्त और आक्रामक नेता की छवि पर मुहर लगाना चाहते हैं। दूसरी तरफ इज़रायली सेना (IDF) के अनुभवी अफसरों को अमेरिका के सहयोग और ठीक तैयारी के बगैर जंग में उतरना खतरनाक लग रहा है।
अगले तीन से चार दिन मध्य पूर्व और इज़रायल के भविष्य के लिए बेहद निर्णायक माने जा रहे हैं। अमेरिका की मध्यस्थता से फिलहाल महायुद्ध की चिंगारी टल गई है, लेकिन इराण की सीमा पर तनाव और परमाणु कार्यक्रम के मुद्दे को देखते हुए यह शांति कितने दिन टिकेगी, इस पर अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों में शंका जताई जा रही है।
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