IC3 इंस्टिट्यूट की रिपोर्ट: 12वीं के करीब 59% छात्र अपनी स्कूल लाइफ से खुश नहीं
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मुंबई के IC3 इंस्टिट्यूट के स्टूडेंट वेल-बीइंग पल्स सर्वे में 8,542 से ज्यादा विद्यार्थी शामिल हुए। रिपोर्ट में नींद, करिअर काउंसलिंग और मानसिक सेहत को लेकर चिंताजनक आंकड़े सामने आए हैं।
आज के बच्चों की जिंदगी सिर्फ किताबों, होमवर्क और रिजल्ट तक सीमित नहीं रह गई है। उस पर मानसिक तनाव, भविष्य का डर और अनिश्चितता का बोझ भी आ गया है। मुंबई के IC3 इंस्टिट्यूट ने 'स्टुडंट वेल-बीइंग पल्स' (Student Well-being Pulse) नाम की रिपोर्ट जारी की है और इसके आंकड़े चौंकाने वाले हैं।
इस सर्वे में देश भर के 8,542 से ज्यादा विद्यार्थी शामिल हुए। रिपोर्ट के मुताबिक 12वीं के लगभग 59% बच्चे अपनी स्कूल लाइफ से संतुष्ट नहीं हैं और उन्हें स्कूल जाना एक बोझ लगने लगा है। सुबह स्कूल जाने की खुशी अब उनके लिए बस एक औपचारिकता बनकर रह गई है।
सर्वे में यह भी सामने आया कि हर 5 में से 1 विद्यार्थी को जिंदगी में शायद ही कभी शांति, प्रेरणा या उत्साह महसूस होता है। लड़कों के मुकाबले लड़कियों में लगातार गहरी उदासी और डिप्रेशन का अनुपात करीब दोगुना है। रिपोर्ट के अनुसार किशोरावस्था में लड़कियां अपना तनाव अंदर ही अंदर दबाकर रखती हैं।
40 फीसदी से ज्यादा बच्चों को तो यह भी नहीं पता कि उनके अपने स्कूल में मेंटल हेल्थ सपोर्ट या काउंसलिंग कहां मिलती है। परीक्षा का भारी सिलेबस, पालकों की उम्मीदें और साथियों के बीच की होड़ बच्चों को मानसिक रूप से थका रही है। उन्हें स्कूल सीखने और खुश रहने की जगह कम, तनाव पैदा करने वाली फैक्टरी ज्यादा लगने लगा है।
तनाव की दूसरी सबसे बड़ी वजह भविष्य को लेकर उलझन है। रिपोर्ट के मुताबिक करीब आधे (50%) विद्यार्थियों को स्कूल स्तर पर कभी ठीक से करिअर काउंसलिंग नहीं मिली। जब बच्चों को साफ नहीं पता होता कि बड़े होकर उन्हें क्या बनना है या कौन सा करिअर उनके लिए सही है, तब भविष्य का डर मन में घर कर जाता है। यही अनिश्चितता उनकी नींद और मन की शांति दोनों छीन रही है।
नींद का हाल भी खराब है। सर्वे के अनुसार 4 में से 3 (75%) सीनियर विद्यार्थियों को 7 से 8 घंटे की नींद नहीं मिलती, जबकि उनके लिए यह कम से कम जरूरी है। इसकी मुख्य वजह पढ़ाई का ओवरलोड और सोने से पहले बेडरूम में मोबाइल स्क्रीन का ज्यादा इस्तेमाल बताया गया है। नींद पूरी न होने से बच्चों में चिड़चिड़ापन, सुस्ती और ध्यान न लगने की समस्या बढ़ रही है।
रिपोर्ट में नॉन-बाइनरी (Non-binary) विद्यार्थियों की मानसिक सेहत सबसे नाजुक और सबसे खराब पाई गई। उन्हें समाज और स्कूल, दोनों जगह खास देखभाल की जरूरत है।
रिपोर्ट के सुझाए उपायों में कहा गया है कि स्कूलों में सिर्फ काउंसलर रख देना काफी नहीं है। टीचर और स्टाफ को इस तरह ट्रेनिंग देनी होगी कि वे 'गेटकीपर' की भूमिका निभा सकें, यानी क्लास में पढ़ाते हुए पहचान सकें कि कौन सा बच्चा तनाव में है और उससे कब प्यार से बात करके सही दिशा दिखानी है।
मुश्किल वक्त में बच्चे सबसे पहले अपने दोस्तों के पास जाते हैं। लेकिन दोस्त भी उसी नासमझ उम्र में होते हैं और पैनिक या एंग्जायटी को सही तरीके से नहीं संभाल पाते। इसलिए स्कूलों में ऐसा सुरक्षित माहौल बनाना जरूरी है, जहां बच्चे बिना झिझक और डर के ट्रेंड काउंसलर के पास जाकर खुलकर अपनी बात रख सकें।
रिपोर्ट इसे 'सायलेंट क्राइसिस' बताती है और कहती है कि इसे वक्त पर नहीं रोका गया तो नई पीढ़ी का भविष्य गंभीर खतरे में पड़ेगा। स्कूल, पालक और नीति बनाने वालों को मिलकर एक व्यावहारिक व्यवस्था बनानी चाहिए, जिसमें पढ़ाई के साथ बच्चों की मानसिक शांति, उनकी खुशी और संतुलित जीवनशैली को भी प्राथमिकता मिले।
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