18 से 25 साल के आधे युवा अपनी तकलीफ किसी को नहीं बताते, सर्वे में खुलासा
मुंबई समेत देश के दस शहरों में हुए एक सर्वे से सामने आया कि युवा अपने इमोशनल स्ट्रगल को खुलकर शेयर नहीं करते और मदद लेने से भी कतराते हैं।
मेंटल हेल्थ को लेकर आजकल पहले से ज्यादा बातें होती हैं, लेकिन शहरों में रहने वाले युवा अब भी अपनी इमोशनल तकलीफें खुलकर सामने नहीं रख पाते। यह बात एक सर्वे में सामने आई है। यह सर्वे 'एम्पॉवर' नाम की संस्था ने 'अनपॅक युअर इमोशनल बॅगेज' टाइटल के तहत किया था।
सर्वे के मुताबिक 18 से 25 साल की उम्र के 49.5 प्रतिशत युवा अपनी परेशानियां किसी को नहीं बताते और अकेले ही उनसे जूझते रहते हैं। सिर्फ 9.2 प्रतिशत लोगों ने माना कि उन्होंने कभी किसी एक्सपर्ट से मदद ली है। यह सर्वे मुंबई समेत देशभर के दस बड़े शहरों में किया गया, जिसमें युवाओं में तनाव, इमोशनल परेशानी और उससे निपटने के तरीके समझने की कोशिश की गई।
रिपोर्ट बताती है कि 40.9 प्रतिशत युवाओं ने खुद कबूल किया कि तबीयत ठीक न होने पर भी वे दूसरों को यही कहते हैं कि सब ठीक है। बहुत से युवा अपनी फीलिंग्स के बारे में बात करने से बचते हैं, तो कुछ खुद को हमेशा बिजी रखकर अपना ध्यान भटकाने की कोशिश करते हैं। सर्वे ने युवाओं के दुख-दर्द को लेकर समाज के नजरिए पर भी सवाल खड़े किए हैं। 40.4 प्रतिशत युवाओं को मुश्किल वक्त में सिर्फ यही सलाह मिली कि 'मजबूत बने रहो'।
दूसरी तरफ, सिर्फ 13.6 प्रतिशत युवाओं ने बताया कि किसी ने उनकी बात सुनी और बिना किसी जजमेंट के उन्हें सपोर्ट किया। महिलाओं को इमोशनल तनाव सबसे ज्यादा झेलना पड़ता है। जो महिलाएं ज्यादा सोचती-विचारती रहती हैं, उनमें से 60 प्रतिशत, जो खुद पर शक करती हैं उनमें से 56 प्रतिशत, और जो अपनी बॉडी शेप को लेकर परेशान रहती हैं उनमें से 69 प्रतिशत महिलाएं शामिल थीं। वहीं जिन्हें काम का प्रेशर महसूस होता है उनमें से 57 प्रतिशत और जिन्हें पैसों को लेकर असुरक्षा महसूस होती है उनमें से 54 प्रतिशत पुरुष थे।
इस इमोशनल तकलीफ का असर रोजमर्रा की जिंदगी पर भी साफ दिख रहा है। 47 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि उन्हें चिड़चिड़ापन महसूस होता है, जबकि 36.7 प्रतिशत को काम पर फोकस करने या उसे एंजॉय करने में दिक्कत आती है। 31.3 प्रतिशत ने माना कि उनकी परेशानी का असर उनके रोजमर्रा के कामकाज पर भी पड़ा। सर्वे में कहा गया है कि सिर्फ युवाओं को जागरूक करना काफी नहीं है, उन्हें एक ऐसा सेफ माहौल भी देना जरूरी है जहां वे बिना डर और झिझक के अपनी फीलिंग्स बता सकें और सही वक्त पर मदद मांग सकें।