हंगरी में 126 साल का सबसे भीषण सूखा, खेती, नदी और बिजली उत्पादन पर असर
हंगरी की राष्ट्रीय मौसम सेवा के आंकड़ों के मुताबिक 2026 का सूखा पिछले 126 साल में सबसे तीव्र है और इसकी मार खेती, डेन्यूब नदी और पाक्स परमाणु ऊर्जा परियोजना पर पड़ी है।
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मध्य यूरोप का देश हंगरी इन दिनों भीषण सूखे से जूझ रहा है। हंगरी की राष्ट्रीय मौसम सेवा के आंकड़ों से सामने आया है कि 2026 का सूखा पिछले 126 साल में सबसे तीव्र है। लंबे वक्त तक बारिश नहीं हुई, तापमान बढ़ता गया और जमीन की नमी घटती चली गई, जिससे हालात गंभीर हो गए हैं। इस संकट का असर खेती, नदियों और ऊर्जा उत्पादन पर पड़ रहा है, और पानी की उपलब्धता अब देश के सामने बड़ा सवाल बन गई है।
पानी की कमी की शुरुआत 2025 के उत्तरार्ध से ही महसूस होने लगी थी। 2026 की गर्मियों में स्थिति और बिगड़ गई। जून में लू की लहर आई, जबकि जुलाई और अगस्त में भी तापमान ज्यादा बना रहा। उसी दौरान उम्मीद के मुताबिक बारिश नहीं हुई, तो जमीन की नमी तेजी से कम होती गई।
हंगरी के मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 2026 की गर्मियों में पूरे देश में औसतन सिर्फ 74.1 मिलीमीटर बारिश हुई। यह 1991 से 2020 के बीच की औसत बारिश का महज 36 प्रतिशत था। गर्मियों का औसत तापमान भी सामान्य स्तर से 2.59 डिग्री सेल्सियस ज्यादा दर्ज किया गया। कम बारिश और चढ़ते तापमान ने मिलकर सूखे की तीव्रता बढ़ा दी।
इस सूखे की सबसे ज्यादा मार हंगरी के कृषि क्षेत्र पर पड़ रही है। फसलों को जरूरी पानी नहीं मिला, इसलिए जमीन की नमी घट गई है और फसलों की बढ़वार के साथ पैदावार की गुणवत्ता पर भी असर हुआ है। मक्का उत्पादन के लिए जाने जाने वाले हंगरी में किसानों के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
मक्के की फसल को पर्याप्त पानी न मिलने से पैदावार घटने की आशंका बढ़ गई है। कुछ किसान कम पानी में टिक सकने वाली फसलों, जैसे सूरजमुखी, की ओर मुड़ रहे हैं। लेकिन सिंचाई की व्यवस्था होने के बावजूद पानी कम पड़ रहा है, इसलिए सभी किसानों को राहत नहीं मिल पा रही। फसलों का नुकसान बढ़ा तो किसानों की आमदनी घटेगी और अनाज के बाजार पर भी असर पड़ सकता है। यूरोप की खेती पर जलवायु परिवर्तन का बढ़ता प्रभाव इस संकट से साफ दिख रहा है।
सूखे का असर डेन्यूब नदी के जलस्तर पर भी हुआ है। यूरोप की अहम नदियों में गिनी जाने वाली इस नदी में पानी कम होने से जल परिवहन और औद्योगिक कामकाज के सामने दिक्कतें खड़ी हो गई हैं। नदी के पानी पर निर्भर पाक्स परमाणु ऊर्जा संयंत्र का कामकाज भी पानी की किल्लत से प्रभावित हुआ है। इस संयंत्र में रिएक्टरों को ठंडा रखने के लिए नदी का पानी इस्तेमाल होता है।
सूखे से निपटने के लिए हंगरी में पानी रोकने और जमा करने के वैकल्पिक उपायों पर जोर दिया जा रहा है। कुछ इलाकों में स्वयंसेवक छोटे बांध और पानी रोकने वाले ढांचे बना रहे हैं। कोशिश यह है कि बारिश का पानी जमीन में रिसे, भूजल का स्तर सुधरे और दलदली इलाकों को फिर से जिंदा किया जा सके। हालांकि ऐसे उपायों का असर दिखने में वक्त लगेगा। बढ़ते तापमान और अनियमित बारिश के कारण आगे भी ऐसे संकटों का खतरा बना रह सकता है।