यूक्रेन ने रूस के ओम्स्क और उख्ता की तेल रिफाइनरियों पर ड्रोन से किया हमला
राष्ट्रपति ज़ेलेन्स्की ने 9 अक्टूबर को बताया कि उख्ता और ओम्स्क की रिफाइनरियों पर ड्रोन इस्तेमाल हुए; नुकसान की स्वतंत्र पुष्टि बाकी है।
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रूस और यूक्रेन के बीच जंग और तेज़ होती जा रही है, और इसी बीच यूक्रेन ने रूस के तेल उद्योग को निशाना बनाया है। जानकारी सामने आई है कि रूस की अहम तेल रिफाइनरियों पर ड्रोन से हमले किए गए। इस कार्रवाई से रूस के ऊर्जा क्षेत्र की सुरक्षा का सवाल एक बार फिर उठ खड़ा हुआ है। तेल रिफाइनरियां रूस की अर्थव्यवस्था और फौज की ईंधन सप्लाई के लिए अहम हैं, इसलिए ऐसे हमलों पर खास नज़र रखी जा रही है।
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेन्स्की ने 9 अक्टूबर को इन हमलों की जानकारी दी। उनके मुताबिक उख्ता की तेल रिफाइनरी पर An-196 RS ड्रोन का इस्तेमाल हुआ, जबकि ओम्स्क की रिफाइनरी पर FP-6 किस्म के ड्रोन से हमला किया गया।
बताया गया है कि उख्ता यूक्रेन की सीमा से करीब 1,900 किलोमीटर दूर है। यानी रूस के अंदरूनी इलाकों में मौजूद औद्योगिक केंद्रों पर भी ड्रोन हमले का खतरा पैदा हो गया है। ओम्स्क की रिफाइनरी पर पहले भी हमला हो चुका है। इस बार रिफाइनरी को कितना नुकसान हुआ, इसकी अभी तक कोई स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
इन रिफाइनरियों में कच्चे तेल को प्रोसेस करके पेट्रोल, डीज़ल और दूसरे पेट्रोलियम उत्पाद बनाए जाते हैं। रूस की अर्थव्यवस्था में तेल उद्योग की बड़ी भूमिका है, इसलिए ऐसे हमलों से उत्पादन, ईंधन की सप्लाई और जुड़े औद्योगिक तंत्र पर असर पड़ने की आशंका रहती है। हालांकि हमलों के बाद इन केंद्रों को कितना नुकसान हुआ और उत्पादन पर ठीक-ठीक कितना असर पड़ा, इसकी पक्की जानकारी होना ज़रूरी है।
रूस की रिफाइनरियों पर होने वाले हमले यूक्रेन की जंगी रणनीति का अहम हिस्सा बन गए हैं। तेल उद्योग से रूस को बड़ी आमदनी होती है, और फौज के लिए ज़रूरी ईंधन की सप्लाई भी इसी उद्योग पर निर्भर है। ऐसे हमलों से उत्पादन रुक सकता है, मरम्मत का खर्च बढ़ सकता है और ईंधन के वितरण में रुकावट आ सकती है। इन दो हमलों से रूस की कुल ईंधन सप्लाई पर कितना असर होगा, यह नुकसान और उत्पादन में आई रुकावट कितने समय तक रहती है, इस पर निर्भर करेगा।
इस बीच रूस की तरफ से भी यूक्रेन की ऊर्जा सुविधाओं पर हमले जारी हैं। इससे दोनों देशों के टकराव में ऊर्जा क्षेत्र को निशाना बनाने का सिलसिला बढ़ रहा है, और इसका असर जंग के साथ-साथ दुनिया के ऊर्जा बाज़ार पर भी पड़ सकता है।