गोंडवाना क्लब की अर्जी खारिज, मारिया चांग के साथ विवाद आर्बिट्रेशन में नहीं जाएगा
नागपुर की अदालत ने गोंडवाना क्लब की वह अर्जी ठुकरा दी, जिसमें मारिया चांग के साथ विवाद आर्बिट्रेशन को भेजने की मांग की गई थी।
नागपुर की अदालत ने गोंडवाना क्लब और मारिया चांग के बीच चल रहे विवाद में क्लब को झटका दिया है। क्लब ने अर्जी लगाई थी कि मामला आर्बिट्रेशन के लिए भेज दिया जाए। अदालत ने यह अर्जी खारिज कर दी। यह आदेश 16 अक्टूबर 2026 को जज डॉ. सुजीतकुमार टायडे ने रेगुलर सिविल सूट (RCS) नंबर 167/2026 में दिया।
वादी मारिया चांग की तरफ से एडवोकेट रोहन गौतम पेश हुए।
क्लब की अर्जी आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट 1996 की धारा 8 के तहत लगाई गई थी। इसके साथ सिविल प्रोसीजर कोड के ऑर्डर VII रूल 11 और धारा 151 का भी हवाला दिया गया था। प्रतिवादी यानी क्लब का कहना था कि दोनों पक्षों के बीच हुए एग्रीमेंट में आर्बिट्रेशन की शर्त है, इसलिए अदालत इस दावे को सुन ही नहीं सकती।
मारिया चांग ने इस अर्जी का विरोध किया। उनका कहना था कि यह दावा स्मॉल कॉज़ेज़ कोर्ट के सामने चलने लायक है।
अदालत के आदेश के मुताबिक विवाद उस जगह को लेकर है, जिसमें चांग अपहिल कैफे चलाती हैं। यह जगह 23 नवंबर 2023 को हुए लिखित एग्रीमेंट के तहत उनके पास थी। एग्रीमेंट में हर महीने 50,000 रुपये किराया और उस पर लागू टैक्स तय था। सिक्योरिटी डिपॉजिट 2 लाख रुपये का था और अवधि पांच साल बताई गई थी।
वादी का आरोप है कि क्लब ने 6 जनवरी 2026 को नोटिस लगाया कि कैफे 8 जनवरी से बंद रहेगा। उनके मुताबिक इसके लिए न पहले कोई बातचीत की गई और न एग्रीमेंट खत्म करने का कोई नोटिस दिया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि उन्होंने अपनी मर्जी से जगह का कब्जा नहीं छोड़ा।
अदालत ने एग्रीमेंट और दोनों पक्षों की दलीलें देखीं। इनमें वह आर्बिट्रेशन क्लॉज भी था, जिसका सहारा प्रतिवादी ने लिया। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले विद्या द्रोलिया बनाम दुर्गा ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन (2021) का हवाला दिया। यह फैसला मकान मालिक और किरायेदार के विवादों में आर्बिट्रेशन की गुंजाइश और उन कानूनों की सीमाओं की बात करता है, जो खास अदालतों या फोरम को खास अधिकार देते हैं।
अदालत इस नतीजे पर पहुंची कि जिस रूप में अर्जी दाखिल हुई है, वह आर्बिट्रेशन एंड कॉन्सिलिएशन एक्ट की धारा 8 के तहत चलने लायक नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ आर्बिट्रेशन क्लॉज होना सिविल प्रोसीजर कोड के ऑर्डर VII रूल 11 के तहत वाद खारिज करने की वजह नहीं बन सकता।
इसी आधार पर अदालत ने अर्जी खारिज कर दी और खर्च के बारे में कोई आदेश नहीं दिया।
यह आदेश सिर्फ प्रतिवादी की अर्जी के चलने लायक होने के बारे में है। कब्जे को लेकर असली विवाद और वादी की बाकी मांगों पर अदालत ने अभी अंतिम फैसला नहीं दिया है।