एचआईवी के साथ बुढ़ापे की ओर बढ़ते लोग: संयुक्त राष्ट्र की संधि में उनकी आवाज की मांग
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के प्रतिनिधियों ने कहा कि लंबी उम्र एक उपलब्धि है, पर बढ़ती उम्र में सम्मान, इलाज और सुरक्षा की गारंटी अब भी नहीं है।
एचआईवी के साथ जी रहे लोग जीवनरक्षक एंटीरेट्रोवायरल दवाओं की बदौलत सामान्य जिंदगी जी रहे हैं। ये दवाएं सरकारी स्वास्थ्य सेवा में निःशुल्क मिलती हैं। सबकी तरह उनकी भी उम्र बढ़ रही है, लेकिन उनके सामने चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। सामाजिक भेदभाव, उम्र के साथ बढ़ती दूसरी बीमारियां, आर्थिक तंगी और स्वास्थ्य सेवाओं के बीच तालमेल की कमी उनके अधिकारों और सम्मान पर असर डाल रही है। एचआईवी के साथ जीवित लोगों की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र की प्रस्तावित संधि बढ़ती उम्र के लोगों के सम्मान, जेंडर समानता और सरकारों की जवाबदेही को पक्का करे।
एचआईवी महामारी की तस्वीर बदल रही है। एंटीरेट्रोवायरल दवाओं, वैज्ञानिक प्रगति और समुदायों के प्रयासों से अब एचआईवी के साथ जी रहे लोग लंबा और स्वस्थ जीवन बिता रहे हैं। जब किसी व्यक्ति का वायरल लोड लगातार इतना कम रहता है कि जांच में पता नहीं चलता, तो वह यौन संपर्क के जरिए एचआईवी का संक्रमण नहीं फैलाता। लेकिन इस कामयाबी के साथ एक नई चुनौती भी आई है। लंबा और सामान्य जीवन जीने वालों को आज भी सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकारों की गारंटी नहीं मिली है।
42 वर्षों से एचआईवी के साथ जी रहीं निकोलेटा पोलिसेक ने कहा, "हम इतिहास के एक बेहद अहम दौर में हैं। पहली बार एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के पास उम्रदराज होने का अवसर है।" पोलिसेक "प्रिज्मा" की सह-संस्थापक और निदेशक हैं। उनके लिए लंबी उम्र केवल चिकित्सा विज्ञान की उपलब्धि नहीं, बल्कि सामूहिक संघर्ष, संवेदना और समुदायों के दृढ़ संकल्प का नतीजा है। उन्होंने यह बात शी एंड राइट्स सत्र में रखी।
अनुमानों के मुताबिक 2025 में दुनिया भर में एचआईवी के साथ जी रहे करीब 1.15 करोड़ लोग 50 वर्ष या उससे अधिक उम्र के थे। यह कुल संख्या का लगभग 29 प्रतिशत था। अनुमान है कि 2040 तक यह संख्या बढ़कर 2.02 करोड़ हो जाएगी, जो कुल का करीब 51 प्रतिशत होगी। एचआईवी के साथ उम्र बढ़ना कई लोगों के लिए जटिल हो सकता है और कुछ में उम्र से जुड़ी बीमारियां अपेक्षाकृत जल्दी सामने आती हैं, पर अनुभव हर व्यक्ति में एक जैसा नहीं होता। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय संबंधी बीमारियों और अन्य गैर-संचारी रोगों के साथ मानसिक स्वास्थ्य, चलने-फिरने की परेशानी और सामाजिक अलगाव के लिए भी देखभाल की जरूरत पड़ सकती है।
जिम्बाब्वे में एचआईवी के साथ जीवित लोगों के समूह जेडएनएनपी प्लस में पैरवी प्रमुख तारिरो कुताद्जा ने कहा, "लंबा जीवन जीना एक उपलब्धि है। अब लक्ष्य है कि लोग अच्छी सेहत और सम्मान के साथ उम्र बढ़ाएं।" अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने बताया कि कई बीमारियों से जूझते लोगों को भेदभाव, अकेलेपन और इलाज के सीमित विकल्पों का भी सामना करना पड़ता है। उनका कहना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की सफलता सिर्फ वायरल लोड काबू में होने से न आंकी जाए। इलाज की निरंतरता, दूसरी बीमारियों की समय पर पहचान, मानसिक स्वास्थ्य और जरूरत के मुताबिक देखभाल भी उतनी ही अहम होनी चाहिए।
भारत में एचआईवी के साथ जीवित लोगों के समूह एनसीपीआई प्लस की सह-संस्थापक और पूर्व अध्यक्ष दक्षा पटेल ने स्वास्थ्य व्यवस्था की बिखरी हुई बनावट की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने बताया कि ऐसे लोगों को अलग-अलग अस्पतालों और विभागों के चक्कर लगाने पड़ सकते हैं। सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए कई दस्तावेज और पात्रता की शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं, और उनकी जरूरतों के हिसाब से स्वास्थ्य बीमा और सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था भी पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सहकर्मी सहायता नेटवर्क मजबूत करने और ऐसी सामुदायिक निगरानी व्यवस्था की जरूरत बताई, जो स्वास्थ्य सेवाओं से इनकार, भेदभाव और सरकारी योजनाओं तक पहुंच की बाधाओं को दर्ज करे।
तारिरो कुताद्जा ने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं के एकीकरण और कार्यक्रमों के नए ढांचे की बात तभी सार्थक है, जब वह बढ़ती उम्र के लोगों के असली अनुभवों और जरूरतों को ध्यान में रखे। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि उम्र बढ़ने पर टीबी का जोखिम अन्य लोगों की तुलना में दो से तीन गुना तक हो सकता है, और एचआईवी के साथ जी रहे लोगों के लिए यह जोखिम और बढ़ जाता है। अंतरराष्ट्रीय सहायता बजट पर दबाव बढ़ने और देशों की घरेलू वित्तीय प्राथमिकताएं बदलने के बीच खतरा है कि बढ़ती उम्र के लोगों की जरूरतें पीछे छूट जाएं।
पोलिसेक ने कहा, "उम्र का सवाल राजनीतिक है।" उनके मुताबिक संसाधनों का बंटवारा, सार्वजनिक सेवाओं का ढांचा और बढ़ती उम्र के लोगों के लिए सम्मानजनक जिंदगी की परिभाषा तय करना, ये सभी राजनीतिक फैसले हैं। उन्होंने आगाह किया कि सार्थक भागीदारी के लिए लगातार आर्थिक मदद, प्रशिक्षण, आसान प्रक्रियाएं, काम के अनुरूप उचित भुगतान और प्रतिभागियों की पहचान की सुरक्षा जरूरी है। समुदायों की भागीदारी का मतलब यह नहीं कि सरकारें अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट जाएं।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में बढ़ती उम्र के लोगों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी रूप से बाध्यकारी अंतरराष्ट्रीय दस्तावेज तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है। मांग है कि संधि में सरकारों के लिए साफ कानूनी दायित्व हों, जो उम्र या एचआईवी स्थिति के आधार पर स्वास्थ्य सेवाओं, बीमा, रोजगार, आवास, सामाजिक सुरक्षा और दीर्घकालिक देखभाल में भेदभाव रोकें। इसमें निजता और गोपनीयता की गारंटी भी हो, क्योंकि किसी की एचआईवी स्थिति का उसकी अनुमति के बिना खुलासा उसे भेदभाव, दुर्व्यवहार और सामाजिक बहिष्कार के जोखिम में डाल सकता है। पोलिसेक के मुताबिक संयुक्त राष्ट्र की यूनिवर्सल पीरियॉडिक रिव्यू प्रक्रिया सरकारों के कामकाज की समीक्षा का एक अहम मंच है।
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