दिल्ली विधानसभा में नागपुर की राठोड बहनों का कमाल, दिपाली बनीं बाल संसद आयकॉन
नागपुर के डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर महाविद्यालय की दिपाली और अंजली राठोड ने राष्ट्रीय पर्यावरण बाल संसद २०२६ में महाराष्ट्र और विदर्भ की नुमाइंदगी की।
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नागपुर की दीक्षाभूमि पर बने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर महाविद्यालय में पढ़ने वाली दो सगी बहनों, कु. दिपाली श्रीपत राठोड और कु. अंजली श्रीपत राठोड ने दिल्ली में अपनी अलग पहचान बनाई है। दिल्ली विधानसभा के परिसर में हुई 'राष्ट्रीय पर्यावरण बाल संसद (RPBS) २०२६' में दोनों ने महाराष्ट्र और विदर्भ की नुमाइंदगी की।
यह बाल संसद मानव रचना इंटरनेशनल स्कूल्स और 'पर्यावरण संरक्षण गतिविधि' ने मिलकर कराई थी। यह सिर्फ भाषण की प्रतियोगिता नहीं थी। आने वाले कल के नेताओं को तैयार करने वाली एक संसदीय प्रयोगशाला जैसी थी।
चयन की प्रक्रिया काफी कड़ी रही। देश भर के हजारों विद्यार्थियों की भागीदारी में से अलग-अलग राज्यों के ९४ प्रतिनिधि चुने गए। इनमें से ६८ प्रतिनिधियों को अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों की जिम्मेदारी दी गई। इन चुने हुए विद्यार्थियों को दिल्ली विधानसभा में अपने विचार असरदार तरीके से रखने का मौका मिला।
बच्चों को लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था, नीति बनाने और पर्यावरण के जलते सवालों पर गहराई से सोच-विचार का सीधा अनुभव मिला। संसद का कामकाज समझना, पढ़-लिखकर अपनी बात रखना और जिम्मेदारी से अपनी भूमिका निभाना, ये सब सीखने का मौका उन्हें मिला।
पूरे महाराष्ट्र से छह विद्यार्थी चुने गए। उनमें नागपुर के डॉ. आंबेडकर महाविद्यालय की ये दोनों सगी बहनें भी शामिल थीं। एक ही परिवार की दोनों बहनों के राष्ट्रीय मंच पर साथ हिस्सा लेने से विदर्भ का मान बढ़ा।
इस बाल संसद में दिपाली राठोड ने सत्ताधारी मंत्रिमंडल में केंद्रीय कोयला मंत्री की भूमिका निभाई। वहीं अंजली राठोड ने विपक्ष की भूमिका में रहकर कोयला मंत्रालय से जुड़े मुद्दों पर अपनी बात रखी। एक बहन ने मंत्री के तौर पर विषय रखा और दूसरी ने विपक्ष की तरफ से उसी विषय की बारीकी से जांच की। इससे दोनों की पढ़ाई-लिखाई, बोलने की कला और तर्क की ताकत दिखी।
पर्यावरण संरक्षण, जलवायु परिवर्तन और टिकाऊ विकास जैसे विषयों पर सोच-समझकर विचार रखने का मौका इस बाल संसद में मिला। दिपाली राठोड को उनके असरदार भाषण के लिए 'बाल संसद आयकॉन' (Baal Sansad ICON) का सम्मान मिला। वे इस ऐतिहासिक पहली बाल संसद की इकलौती आयकॉन रहीं। उनके दो मिनट के भाषण ने मौजूद लोगों का दिल जीत लिया और देश भर से आए प्रतिनिधियों ने भी उनकी तारीफ की।
बंजारा समाज का प्रकृति से पुराना रिश्ता रहा है। जमीन, पानी और जंगल से जुड़ी जीवनशैली, पारंपरिक ज्ञान और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत इस समाज की पहचान है। लेकिन आज के दौर में शिक्षा और समाज की मुख्य धारा में जगह बनाने के लिए समाज को कई चुनौतियों से जूझना पड़ा है। जब समाज की लड़कियां देश की राजधानी की विधानसभा में भरोसे के साथ अपनी बात रखती हैं, तो यह उनकी निजी कामयाबी के साथ पूरे समाज का सम्मान भी बन जाता है।
दिपाली और अंजली की कामयाबी से यह संदेश मिलता है कि शिक्षा, जिद और मौके के दम पर नई ऊंचाइयां छुई जा सकती हैं। वंचित तबके की लड़कियों के लिए वे प्रेरणा बनी हैं। पर्यावरण पर चर्चा में पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय अनुभव और वैज्ञानिक नजरिए को साथ जोड़ने की जरूरत भी इस मंच से सामने आई।
नागपुर की दीक्षाभूमि समता, भाईचारे और सामाजिक क्रांति की पवित्र जगह है। इसी विचार से जुड़ा डॉ. आंबेडकर महाविद्यालय विद्यार्थियों की पढ़ाई और बौद्धिक विकास में अहम भूमिका निभाता आया है। कॉलेज की प्राचार्या, प्राध्यापकों और प्रशासनिक कर्मचारियों का प्रोत्साहन विद्यार्थियों की छिपी प्रतिभा को निखारने में काम आता है। दिपाली और अंजली ने इस मौके का फायदा उठाकर राष्ट्रीय मंच पर अपनी काबिलियत साबित की।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का संदेश 'सीखो, संगठित बनो और संघर्ष करो' शिक्षा से स्वाभिमान, संगठन से सामूहिक ताकत और संघर्ष से बदलाव की प्रेरणा देता है। इन बहनों की कामयाबी से इन विचारों की अहमियत फिर सामने आती है।
७ अक्टूबर २०२६ को दिल्ली विधानसभा में हुआ उनका यह हिस्सा सिर्फ एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं था। यह पर्यावरण के सवालों पर जागरूक और जिम्मेदार युवा नेतृत्व तैयार करने की दिशा में एक अहम कदम था। आज पूरी दुनिया प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और प्राकृतिक संसाधनों की कमी जैसी समस्याओं से जूझ रही है। ऐसे में पर्यावरण बचाने के लिए नौजवानों का आगे आना वक्त की जरूरत है।
दिपाली और अंजली की परवरिश में श्री श्रीपत राठोड और श्रीमती जयश्री राठोड की बुनियादी भूमिका रही है। उन्होंने बेटियों में मेल-जोल, लगन और आपसी इज्जत के संस्कार डाले। एक-दूसरे से तुलना करने के बजाय एक-दूसरे की खूबियों की तारीफ करना, हौसला बढ़ाना और साथ मिलकर आगे बढ़ना, इन बातों को उन्होंने अहमियत दी। घर में खुली बातचीत और सहयोग का माहौल बनाकर उन्होंने दोनों बेटियों को पढ़ाई, निजी और सामाजिक चुनौतियों का हिम्मत से सामना करने की ताकत दी। इन्हीं संस्कारों से दोनों बहनें अपनी स्वतंत्र सोच वाली बनी हैं और अपनी उपलब्धियों से दूसरों को भी प्रेरित कर रही हैं।
दिपाली और अंजली श्रीपत राठोड की यह कामयाबी पूरे महाराष्ट्र, विदर्भ और बंजारा समाज के लिए गर्व की बात है। राष्ट्रीय पर्यावरण बाल संसद जैसे मंच पर मिला मौका और उनके रखे विचार उनकी जिद, पढ़ाई और नेतृत्व की क्षमता की गवाही देते हैं।