इंटरनेशनल ई-वेस्ट डे: घर का पुराना मोबाइल बन सकता है सेहत और पर्यावरण के लिए खतरा
14 अक्टूबर को मनाए जाने वाले इंटरनेशनल ई-वेस्ट डे पर ई-कचरे के खतरे और उसके रीसायकल की अहमियत।
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स्मार्टफोन, लैपटॉप, टीवी और स्मार्ट गैजेट्स के बिना आज की जिंदगी की कल्पना करना मुश्किल हो गया है। टेक्नोलॉजी ने रोजमर्रा का काम आसान जरूर किया है, लेकिन इसका एक दूसरा और बेहद गंभीर पहलू भी है। हर साल करोड़ों पुराने और खराब इलेक्ट्रॉनिक सामान कचरे के रूप में खुले में फेंक दिए जाते हैं। इसी को ई-वेस्ट यानी ई-कचरा कहा जाता है।
ई-कचरे की बढ़ती चुनौती और उससे होने वाले खतरों के बारे में दुनिया भर में जागरूकता फैलाने के लिए हर साल 14 अक्टूबर को इंटरनेशनल ई-वेस्ट डे मनाया जाता है। यह दिन WEEE Forum की ओर से शुरू किया गया है। इसका मकसद है कि घरों, दफ्तरों और उद्योगों में निकलने वाले इलेक्ट्रॉनिक कचरे का सही तरीके से निपटारा हो।
मोबाइल फोन, कंप्यूटर, लैपटॉप, प्रिंटर, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर, माइक्रोवेव, वॉशिंग मशीन से लेकर साधारण चार्जर और छोटी तार तक, जब ये चीजें इस्तेमाल लायक नहीं रहतीं या फेंक दी जाती हैं, तो ई-कचरा बन जाती हैं। आज दुनिया भर में ई-कचरे की मात्रा हर साल कई गुना बढ़ रही है, जो आने वाले समय के लिए बड़ी खतरे की घंटी है।
कई बार लोग घर के खराब मोबाइल या दूसरे इलेक्ट्रॉनिक सामान को आम कचरे के साथ फेंक देते हैं। लेकिन यह कचरा आम जैविक कचरे की तरह आसानी से मिट्टी में नहीं घुलता। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में सीसा (Lead), पारा (Mercury), कैडमियम (Cadmium), आर्सेनिक और बेरिलियम जैसी बेहद जहरीली भारी धातुएं और खतरनाक रसायन होते हैं। जब यह कचरा खाली प्लॉट या डंपिंग ग्राउंड पर फेंका जाता है, तो बारिश के पानी के साथ ये जहरीले रसायन जमीन में उतर जाते हैं और भूजल के स्रोतों को दूषित कर देते हैं।
दूषित पानी और मिट्टी के जरिए ये रसायन खाने की चेन में पहुंच जाते हैं और इसका सीधा असर इंसान की सेहत पर पड़ता है। सीसे के संपर्क से नर्वस सिस्टम और किडनी को गंभीर नुकसान हो सकता है। पारे से दिमाग की कार्यक्षमता पर बुरा असर पड़ता है, जबकि कैडमियम से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का खतरा रहता है। इसके अलावा गलत तरीके से कचरा जलाने पर होने वाले वायु प्रदूषण से सांस की बीमारियां बढ़ती हैं। इसीलिए ई-कचरा सिर्फ पर्यावरण का दुश्मन नहीं, बल्कि इंसानी सेहत का अदृश्य 'साइलेंट किलर' बन गया है।
इस समस्या से निपटने के लिए ई-कचरे का सही मैनेजमेंट और रीसायकलिंग सबसे जरूरी है। इलेक्ट्रॉनिक सामान में सिर्फ जहरीले तत्व ही नहीं होते, बल्कि सोने-चांदी के बारीक अंश, तांबा, एल्युमिनियम और दुर्लभ धातुएं (Rare Earth Elements) भी होती हैं। अगर पुराना इलेक्ट्रॉनिक सामान सही रीसायकलिंग प्रक्रिया से गुजरे, तो इन कीमती धातुओं का दोबारा इस्तेमाल हो सकता है। इससे प्राकृतिक संसाधनों की खुदाई कम होती है और बड़े पैमाने पर ऊर्जा की बचत होती है।
इंटरनेशनल ई-वेस्ट डे के मौके पर स्कूल, कॉलेज, सामाजिक संस्थाओं और निजी उद्योगों में ई-कचरा जमा करने के खास अभियान चलाए जाते हैं। इन अभियानों के जरिए लोगों से अपील की जाती है कि घर के पुराने गैजेट्स अधिकृत संग्रह केंद्रों पर जमा करें। एक जिम्मेदार ग्राहक के नाते हमें टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करते वक्त '3R' यानी Reduce, Reuse, Recycle का फॉर्मूला अपनाना चाहिए। नया मोबाइल या गैजेट खरीदने से पहले पुराने को ठीक कराकर चलाना या सही रीसायकलिंग एजेंसी को सौंप देना आज की जरूरत है।
टिकाऊ विकास (Sustainable Development) का लक्ष्य हासिल करना है, तो ई-कचरे की समस्या को गंभीरता से लेना होगा। सिर्फ सरकार या प्रशासन के भरोसे न रहकर हर नागरिक को इसमें सक्रिय हिस्सा लेना जरूरी है। छोटी सी पहल से हम आने वाली पीढ़ी को साफ, सुंदर और जहर से मुक्त पर्यावरण दे सकते हैं। आज का इंटरनेशनल ई-वेस्ट डे हमें इसी नैतिक जिम्मेदारी की याद दिलाता है।