धनत्रयोदशी पर क्यों होती है भगवान धन्वंतरी की पूजा, समुद्रमंथन से जुड़ी है कथा
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भगवान धन्वंतरी आरोग्य के देवता और आयुर्वेद के प्रवर्तक माने जाते हैं। जानिए उनके नाम का मतलब, समुद्रमंथन की कथा और धनत्रयोदशी से उनका रिश्ता।
हिंदू धर्म में भगवान धन्वंतरी को आरोग्य का देवता, आयुर्वेद का प्रवर्तक और देवताओं का वैद्य (डॉक्टर) माना जाता है। हिंदू संस्कृति में निरोगी जीवन की बड़ी अहमियत है और इसी आरोग्य के अधिष्ठाता के तौर पर धन्वंतरी की पूजा की जाती है। धनत्रयोदशी पर उनकी पूजा क्यों होती है, वे कौन हैं, उनकी उत्पत्ति कैसे हुई और उनसे जुड़ी पौराणिक कथा क्या है, यह सब यहां एक-एक करके समझते हैं।
सबसे पहले नाम की बात। 'धन्वंतरी' शब्द 'धन्वन्' और 'अरी' से मिलकर बना है। 'धन्वन्' का मतलब धनुष या शल्यचिकित्सा (सर्जरी) है, जबकि 'अरी' का मतलब पारंगत होता है। यानी जिसे वैद्यकीय शास्त्र का, खासकर शल्यचिकित्सा का पूरा ज्ञान हो, उसे धन्वंतरी कहा जाता है।
धन्वंतरी को भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। उनके चार हाथों में शंख, चक्र, औषधीय वनस्पति (या जोंक, यानी जलौका) और सबसे खास, 'अमृत से भरा कलश' रहता है। आयुर्वेद के मूल प्रणेता होने की वजह से उनका महत्व बहुत ज्यादा है।
उनकी उत्पत्ति की सबसे मशहूर कथा समुद्रमंथन से जुड़ी है, जो श्रीमद्भागवत पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत में मिलती है। कथा के मुताबिक महर्षि दुर्वास के शाप से देवराज इंद्र और उनके साथ सारे देवता ऐश्वर्य और शक्ति से हीन हो गए। दैत्यों (राक्षसों) ने देवताओं पर जीत हासिल कर ली। इस संकट से निकलने के लिए सारे देवता भगवान विष्णु के पास पहुंचे।
विष्णु ने उन्हें सलाह दी कि असुरों के साथ मिलकर समुद्रमंथन करें और उससे निकलने वाला अमृत पीकर अमर हो जाएं। इसके बाद देवताओं और दानवों ने मंदार पर्वत को मथनी और वासुकी नाग को रस्सी बनाकर क्षीरसागर (दूध के समुद्र) का मंथन शुरू किया।
इस मंथन से कुल 14 रत्न निकले। लक्ष्मी, कामधेनु, ऐरावत हाथी और कल्पवृक्ष के बाद सबसे आखिर में, कार्तिक महीने के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को, एक बेहद तेजस्वी पुरुष समुद्र से प्रकट हुए।
यही तेजस्वी रूप भगवान धन्वंतरी का था। वे दिखने में बहुत सुंदर थे, उनकी छाती विशाल थी और वे चतुर्भुज यानी चार हाथों वाले थे। प्रकट होते समय उनके हाथ में अमृत से भरा सोने का कलश था। इसी कलश के साथ प्रकट होने से देवताओं के लिए अमरत्व पाना मुमकिन हुआ।
जिस दिन धन्वंतरी समुद्रमंथन से प्रकट हुए, उसी दिन को धनत्रयोदशी (दिवाली का पहला दिन) के रूप में मनाया जाता है। इस दिन सिर्फ धन-संपत्ति की पूजा नहीं होती, बल्कि सही मायनों में 'आरोग्य रूपी धन' की पूजा की जाती है। भारत सरकार ने इस दिन को 'राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस' घोषित किया है। इस दिन लोग अच्छी सेहत और बीमारियों से मुक्ति के लिए धन्वंतरी की उपासना करते हैं और दीपदान करते हैं।
पुराणों के अनुसार, समुद्रमंथन से प्रकट होने के बाद धन्वंतरी ने विष्णु से पूछा कि दुनिया में उनकी जगह क्या होगी। तब विष्णु ने कहा, 'तू लोगों के दुख और रोग दूर करने के लिए धरती पर फिर जन्म लेगा।' उसी के अनुसार द्वापर युग में काशी के राजा 'धन्वा' के यहां धन्वंतरी ने 'दिवोदास' के रूप में जन्म लिया। उन्होंने ऋषि-मुनियों और आम इंसानों को आयुर्वेद का ज्ञान दिया।
सुश्रुत संहिता के रचयिता 'महर्षि सुश्रुत' राजा दिवोदास (धन्वंतरी) के ही शिष्य थे। दिवोदास ने उन्हें शल्यचिकित्सा (सर्जरी) का दुनिया का पहला उन्नत ज्ञान दिया।
हिंदू संस्कृति में 'पहला सुख निरोगी काया' यानी निरोगी शरीर को पहला सुख माना जाता है। भगवान धन्वंतरी इसी आरोग्य का प्रतीक हैं। इंसान बीमारियों से बचा रहे, इसलिए उन्होंने आयुर्वेद जैसा महान शास्त्र दिया। यही वजह है कि आज भी किसी इलाज या दवा की शुरुआत करते समय भगवान धन्वंतरी को याद किया जाता है।
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