भंडारा में नौ महीने में बाघ, तेंदुए और भालू के हमलों में 7 की मौत
जनवरी से सितंबर के बीच जंगल से सटे गांवों में वन्यप्राणियों के हमलों में सात लोगों की जान गई, फसल और पशुधन का नुकसान अलग।
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भंडारा जिले में जंगल से सटे गांवों में वन्यप्राणियों के हमले बढ़ रहे हैं और इससे इंसान और वन्यजीव के बीच संघर्ष का सवाल खड़ा हो गया है। जनवरी से सितंबर तक की उपलब्ध जानकारी के मुताबिक बाघ, भालू और तेंदुए के हमलों में सात लोगों की मौत दर्ज की गई है। जिले में नवेगांव-नागझिरा व्याघ्र रिज़र्व क्षेत्र के साथ जंगल की लंबी पट्टी है, इसलिए कई गांवों का सीधा वास्ता वन्यजीवों से पड़ता है।
जंगल में खाना-पानी मिलने की स्थिति, वन क्षेत्र की हलचल और गांव के पास खेतों में आसानी से मिलने वाला चारा, इन वजहों से जानवर इंसानी बस्ती के पास आ जाते हैं। सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को है जो जंगल में महुआ इकट्ठा करने, घास लाने या खेत में काम करने जाते हैं। हमलों की घटनाएं साकोली तालुका के पापडा, बांपेवाडा, उमरझरी और विर्शी इलाके में दर्ज हुईं। इसके अलावा तुमसर, पवनी और लाखनी तालुका में भी ऐसी घटनाएं हुईं।
घटनाओं का क्रम देखें तो जनवरी में भालू के हमले में गंभीर रूप से घायल हुए एक व्यक्ति की इलाज के दौरान मौत हो गई। मार्च में साकोली इलाके में बाघ के हमले में एक की जान गई। मार्च के आखिर से अप्रैल की शुरुआत के बीच उमरझरी इलाके की एक गंभीर घायल महिला ने इलाज के दौरान दम तोड़ दिया। अप्रैल में विर्शी इलाके में तेंदुए के हमले में एक बच्ची की मौत हुई, जबकि तुमसर वन रेंज के धनेगांव में एक महिला की जान गई। मई में पवनी तालुका के पिलांद्री इलाके में बाघ के हमले में एक व्यक्ति मारा गया। अगस्त में तुमसर तालुका के आगरी में एक चरवाहे की बाघ के हमले में मौत हो गई। इन घटनाओं से जंगल से सटे गांवों के लोगों की सुरक्षा का सवाल फिर सामने आ गया है।
यह संघर्ष सिर्फ जान के नुकसान तक सीमित नहीं है। जंगली सूअर, हिरन, चीतल और सांबर जैसे जानवर खेतों में घुसकर फसल बर्बाद करते हैं। तेंदुआ, भेड़िया और दूसरे हिंसक जानवरों के हमले में पालतू जानवर मारे जाएं तो पशुपालकों को आर्थिक चोट लगती है। जून में पवनी तालुका के कोरंभी इलाके में तेंदुए के हमले में 11 बकरियां मारी गई थीं।
वन विभाग की ओर से त्वरित बचाव दल और कंट्रोल रूम जैसे उपाय चलाए जाते हैं। वन्यप्राणी दिखें या कोई इमरजेंसी हो तो वन विभाग को खबर देने के लिए 1926 टोल-फ्री नंबर उपलब्ध है। सिर्फ घटना के बाद मदद देने के बजाय संवेदनशील गांवों की पहचान, जानवरों की हलचल पर नजर, फौरन सूचना देने की व्यवस्था, जंगल के पास सुरक्षित रास्ते, जागरूकता और मुआवजा समय पर देने को प्राथमिकता देने की जरूरत बताई गई है। जंगल पर निर्भर रोजी-रोटी वाले लोगों को दूसरे रोजगार के मौके देना भी लंबे समय के उपायों का हिस्सा हो सकता है।