UNGA में एर्दोगान की बड़ी मांग, अमेरिका-चीन समेत 5 देशों से छीनो वीटो पावर
तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के नकाराधिकार को खत्म करने की मांग की, कहा जग सिर्फ पांच देशों से नहीं चलता
दुनिया में जब भी कोई बड़ी जंग, भू-राजनीतिक तनाव या अंतरराष्ट्रीय संकट खड़ा होता है, तो सबकी निगाहें संयुक्त राष्ट्र की तरफ जाती हैं। लेकिन कई बड़े मसलों पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) कोई हल निकालने में नाकाम रहती दिखती है। इसकी सबसे बड़ी वजह सुरक्षा परिषद के 5 स्थायी सदस्यों के पास मौजूद 'नकाराधिकार' यानी वीटो पावर है। इसी मुद्दे को लेकर तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तय्यिप एर्दोगान ने अब जोरदार आवाज उठाई है और साफ मांग रखी है कि सुरक्षा परिषद से नकाराधिकार हमेशा के लिए हटा दिया जाए।
एर्दोगान का कहना है कि आज की दुनिया बहुत बदल चुकी है, मगर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद अब भी दूसरे विश्व युद्ध के बाद बनी पुरानी बनावट पर ही चल रही है। दुनिया के ज्यादातर देशों के हित से जुड़े फैसले सिर्फ इसलिए अटक जाते हैं क्योंकि 5 स्थायी सदस्यों में से कोई एक देश उन्हें वीटो कर देता है। उनका कहना है कि जब तक सुरक्षा परिषद की यह बेलगाम ताकत और नकाराधिकार की खास छूट खत्म नहीं होती, तब तक दुनिया में शांति और इंसाफ मिलना मुमकिन नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय न्यूज एजेंसी ब्लूमबर्ग में छपे एक खास लेख में एर्दोगान ने वैश्विक राजनीति पर अपनी बेबाक राय रखी। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में दुनिया ने कई बड़ी महामारियां, इलाकाई जंगें और ऊर्जा-अनाज संकट झेले हैं। इन सब घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि अंतरराष्ट्रीय समस्याओं का हल कुछ चुनिंदा और दबंग देशों की राजधानियों में नहीं लिया जा सकता।
एर्दोगान ने कहा, "अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सच में इंसाफ चाहिए तो संयुक्त राष्ट्र प्रणाली में गहरे और ठोस सुधारों का रोडमैप बनाना होगा। इन सुधारों में नकाराधिकार खत्म करना ही सबसे पहला और सबसे अहम कदम होना चाहिए।" उन्होंने खास तौर पर जोर दिया कि किसी एक देश को दुनिया के बाकी 100 से ज्यादा देशों की राय या फैसले रोकने का हमेशा के लिए हक नहीं मिलना चाहिए।
फिलहाल संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस, ये 5 स्थायी सदस्य हैं। इन्हीं देशों के पास वीटो पावर है। सीधी भाषा में समझें तो अगर सुरक्षा परिषद में रखा कोई प्रस्ताव 14 सदस्यों को मंजूर हो, लेकिन इन 5 स्थायी सदस्यों में से कोई एक भी उसका विरोध यानी वीटो कर दे, तो वह प्रस्ताव तुरंत खारिज हो जाता है। अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि स्थायी सदस्य देश दुनिया की भलाई के बजाय अपने ही राजनीतिक और सैन्य हितों को बचाने के लिए इस नकाराधिकार का गलत इस्तेमाल करते हैं। एर्दोगान के मुताबिक यह तरीका पूरी तरह नाइंसाफी वाला है। उन्होंने अपनी मशहूर लाइन "द वर्ल्ड इज बिगर दैन फाइव" यानी "दुनिया सिर्फ 5 देशों से कहीं बड़ी है" को दोहराते हुए प्रस्ताव रखा कि सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता वाली यह पूरी बनावट ही खत्म कर दी जाए और सारे सदस्यों को महासभा के जरिए तय वक्त के लिए चुना जाए।
संयुक्त राष्ट्र में असली मायने में लोकतंत्र लाने के लिए एर्दोगान ने संयुक्त राष्ट्र महासभा (UN General Assembly) की भूमिका मजबूत करने की अपील की है। उनका कहना है कि सुरक्षा परिषद को महासभा के आगे ज्यादा जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। जिन देशों को सुरक्षा परिषद में फिर से जगह चाहिए, उन्हें महासभा में सभी देशों का बहुमत हासिल कर अपनी काबिलियत साबित करनी होगी, ऐसा नया नियम लागू करने की मांग उन्होंने की है। इस बड़े बदलाव के लिए एर्दोगान ने दुनिया के बाकी छोटे-बड़े विकासशील देशों से एक साथ आकर महासभा में एक मजबूत मोर्चा बनाने की अपील की। उनका कहना है कि एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों का वैश्विक अर्थव्यवस्था और राजनीति में योगदान बढ़ा है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय फैसलों में उन्हें भी सही नुमाइंदगी मिलनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र की बनावट बदलने की यह मांग सिर्फ एर्दोगान की नहीं है। इससे पहले जर्मनी, भारत, ब्राजील और जापान यानी G4 देश भी सुरक्षा परिषद के विस्तार और सुधार की मांग उठा चुके हैं। हाल ही में जर्मनी के विदेश मंत्री ने भी नकाराधिकार की वजह से सुरक्षा परिषद के कामकाज में आने वाली अड़चनों पर तीखी टिप्पणी की थी। हालांकि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के नियमों के मुताबिक नकाराधिकार खत्म करने या सुरक्षा परिषद की बनावट बदलने के लिए खुद 5 स्थायी सदस्यों की मंजूरी चाहिए होती है, जो आसानी से मिलना मुश्किल है। फिर भी एर्दोगान के इस सवाल ने संयुक्त राष्ट्र की साख और पुराने पड़ चुके वीटो पावर पर दुनिया भर में फिर से तीखी बहस छेड़ दी है।