मंगलवार, 3 नवंबर 2026

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2 नवंबर: पत्रकारों पर हमले के दोषियों को सजा दिलाने के लिए मनाया जाता है यह खास दिन

2 नवंबर: पत्रकारों पर हमले के दोषियों को सजा दिलाने के लिए मनाया जाता है यह खास दिन तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
PT24 टीम

माली में दो फ्रेंच पत्रकारों की हत्या के बाद संयुक्त राष्ट्र ने हर साल 2 नवंबर को पत्रकारों के खिलाफ अपराधों में सजा से छूट खत्म करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस तय किया।

किसी भी समाज को पारदर्शी, जागरूक और जिंदा रखने में पत्रकारों का योगदान बहुत बड़ा माना जाता है। मुश्किल हालात में, जंग के मैदान में, सियासी गड़बड़ी खोलते वक्त या समाज की नाइंसाफी सामने लाते वक्त पत्रकारों को कई बार अपनी जान दांव पर लगानी पड़ती है। सच सामने लाने की कोशिश में हिंसा, छल या अन्याय झेलने वाले सभी पत्रकारों और मीडिया कर्मचारियों की कुर्बानी को याद करने के लिए हर साल 2 नवंबर को "पत्रकारों के खिलाफ अपराधों में सजा से छूट खत्म करने का अंतरराष्ट्रीय दिवस" (International Day to End Impunity for Crimes Against Journalists) मनाया जाता है। यह दिन सिर्फ याद करने का नहीं है। पत्रकारों पर जुल्म करने वालों को कड़ी सजा दिलाने के लिए पूरी दुनिया एक साथ आए, इसका यह एक अहम मंच है।

इस दिन की शुरुआत संयुक्त राष्ट्र के एक फैसले से हुई। 2 नवंबर 2013 को पश्चिम अफ्रीका के देश माली में रिपोर्टिंग करते वक्त "रेडियो फ्रांस इंटरनेशनल" (RFI) के दो वरिष्ठ फ्रेंच पत्रकारों, जिस्लेन ड्यूपॉन्ट (Ghislaine Dupont) और क्लॉड वर्लोन (Claude Verlon) का अपहरण हुआ और बेरहमी से उनकी हत्या कर दी गई। इस वारदात से पूरी दुनिया को बड़ा झटका लगा।

इस त्रासदी के बाद संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 दिसंबर 2013 को अपने 68वें अधिवेशन में एक अहम प्रस्ताव (A/RES/68/163) पास किया। इसी प्रस्ताव के जरिए ऐलान हुआ कि हर साल 2 नवंबर को यह अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाएगा। साल 2014 में पहली बार दुनिया भर में यह दिन मनाया गया। इसका मुख्य मकसद था कि पत्रकारों के खिलाफ अपराध करने वाले दोषी सजा से बच निकलें, यह चलन (Impunity) खत्म हो।

"Impunity" का मतलब क्या है? जब किसी पत्रकार की हत्या होती है, उसे पीटा जाता है या धमकाया जाता है, और गुनहगारों पर कोई कानूनी कार्रवाई नहीं होती या उन्हें अदालती सजा से बचा लिया जाता है, तो उसे सजा से छूट कहते हैं। यूनेस्को (UNESCO) की रिपोर्ट के मुताबिक पिछले दस साल में दुनिया भर में हजारों पत्रकार ड्यूटी करते वक्त मारे गए हैं। सबसे फिक्र की बात यह है कि इन अपराधों के करीब 90 प्रतिशत मामलों में दोषियों को कोई सजा नहीं होती। इससे गुनहगारों की हिम्मत बढ़ती है और पत्रकारों पर हमलों का सिलसिला चलता रहता है।

आज की दुनिया में मीडिया को लोकतंत्र का "चौथा स्तंभ" कहा जाता है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका जितनी जरूरी हैं, उतनी ही जरूरी आजाद पत्रकारिता भी है। पत्रकार भ्रष्टाचार पर रोशनी डालते हैं, लोगों तक सही जानकारी पहुंचाते हैं और सत्ता में बैठे लोगों से जवाब मांगते हैं। सच की आवाज दबाना या हिंसा के डर से पत्रकारों को चुप कराना सीधे-सीधे मानवाधिकार और इंसानी आजादी का उल्लंघन है। जब कोई पत्रकार मारा जाता है या उसे चुप करा दिया जाता है, तो लोगों का जानकारी पाने का हक भी छिन जाता है। इसलिए पत्रकार की हिफाजत सिर्फ एक आदमी की नहीं, पूरे लोकतंत्र की हिफाजत है।

डिजिटल जमाने में पत्रकारों पर खतरे का रूप भी बदल गया है। अब सिर्फ शारीरिक हिंसा या सीधी गोलीबारी ही अकेला खतरा नहीं रहा। खासकर महिला पत्रकारों को सोशल मीडिया पर बड़े पैमाने पर ट्रोलिंग, डिजिटल हिंसा और निजी बदनामी झेलनी पड़ती है। पेगासस जैसे आधुनिक स्पायवेयर से पत्रकारों की गोपनीय जानकारी और बातचीत पर गैरकानूनी तरीके से नजर रखी जा रही है। सच बताने वाले पत्रकारों पर झूठे केस दर्ज करना और सोशल मीडिया पर उनके खिलाफ गलतफहमी फैलाना भी आज की बड़ी चुनौती बन गया है। कई देशों की जंग और फौजी कार्रवाइयों में निष्पक्ष रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की जान लगातार खतरे में रहती है।

पत्रकारों की सुरक्षा की मुख्य जिम्मेदारी संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनेस्को को सौंपी गई है। संयुक्त राष्ट्र ने "UN Plan of Action on the Safety of Journalists and the Issue of Impunity" नाम की खास मुहिम बनाई है। इस योजना के तहत दुनिया भर के देशों से कहा जाता है कि वे पत्रकारों के लिए सुरक्षित माहौल बनाएं, गुनहगारों पर सख्त कार्रवाई करें और आजाद न्याय व्यवस्था खड़ी करें। 2 नवंबर को यूनेस्को दुनिया भर में परिषदें, वर्कशॉप और जागरूकता अभियान करके इस मुद्दे की तरफ ध्यान खींचता है।

तो क्या होना चाहिए? दोषियों को फौरन गिरफ्तार करके अदालत से कड़ी सजा दिलाई जाए। खतरे में पड़े पत्रकारों और उनके परिवारों के लिए सरकार फौरन सुरक्षा का इंतजाम करे। पत्रकारों पर अपराधों की जांच के लिए निष्पक्ष और आजाद विशेष जांच दल (SIT) बने। मीडिया हाउस और अखबार अपने रिपोर्टरों को, खासकर जंग या आपातकाल में काम करने वालों को, पूरा बीमा कवर और सुरक्षा के साधन दें। यह दिन महज औपचारिक कार्यक्रम नहीं, सच, इंसाफ और पारदर्शिता को बचाए रखने का संकल्प है। पत्रकारों की कलम और कैमरे सलामत रहेंगे, तभी लोकतंत्र जिंदा रहेगा।

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