शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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युद्ध में बर्बाद होती कुदरत को बचाने के लिए 6 नवंबर का दिन क्यों है अहम

युद्ध में बर्बाद होती कुदरत को बचाने के लिए 6 नवंबर का दिन क्यों है अहम तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
दुनिया PT24 टीम

हर साल 6 नवंबर को युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने का अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 2001 में इसकी घोषणा की थी।

दुनिया में जब भी कोई युद्ध या सशस्त्र संघर्ष भड़कता है, तो न्यूज चैनलों पर ज्यादातर बातें इंसानी जानों के नुकसान, बम धमाकों और तबाह हुए शहरों की होती हैं। लेकिन इस तबाही की आड़ में कुदरत का भी बड़ा नुकसान चुपचाप होता रहता है। इसकी भरपाई करने में इंसान को कई दशक, यहां तक कि सदियां भी कम पड़ जाती हैं।

युद्ध की आग में जंगल जला दिए जाते हैं। नदियां और पानी के भंडार जहरीले रसायनों से दूषित हो जाते हैं और उपजाऊ जमीन हमेशा के लिए बंजर बन जाती है। इसी गंभीर समस्या की तरफ दुनिया का ध्यान खींचने के लिए हर साल 6 नवंबर को "युद्ध और सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण को रोकने का अंतरराष्ट्रीय दिवस" (International Day for Preventing the Exploitation of the Environment in War and Armed Conflict) मनाया जाता है।

संयुक्त राष्ट्र की महासभा (UN General Assembly) ने 5 नवंबर 2001 को एक खास प्रस्ताव पास करके 6 नवंबर को इस दिन के तौर पर औपचारिक रूप से घोषित किया। मकसद यह था कि पर्यावरण बचाने के लिए दुनिया भर में ठोस कदम उठाए जाएं और अंतरराष्ट्रीय कानूनों में कुदरत की हिफाजत को भी जगह मिले।

संयुक्त राष्ट्र की एक स्टडी के मुताबिक पिछले 60 सालों में दुनिया भर में हुए करीब 40 टक्के आंतरिक और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष कीमती प्राकृतिक संसाधनों को लेकर हुए हैं। इनमें लकड़ी, सोने-चांदी की खदानें, तेल, उपजाऊ जमीन और पानी शामिल हैं। लड़ाई इन संसाधनों पर कब्जे या उनके शोषण को लेकर हुई।

युद्ध के दौरान सैनिक रणनीति के तौर पर अक्सर जंगलों में आग लगा दी जाती है। दुश्मन की रसद काटने के लिए पीने के पानी के कुएं या तालाब जहरीले रसायनों से भर दिए जाते हैं। इन सब हरकतों का नतीजा चाहे जंग के फैसले पर जो भी पड़े, लेकिन स्थानीय इकोसिस्टम को ऐसा नुकसान झेलना पड़ता है जिसकी भरपाई नहीं हो पाती।

आज की जंगों में इस्तेमाल होने वाली मिसाइलें, बम और रासायनिक हथियार धरती पर ऐसा स्थायी निशान छोड़ जाते हैं जो कई पीढ़ियों तक नहीं मिटता। युद्ध में पर्यावरण को होने वाले नुकसान के दो बड़े रूप हैं।

पहला है भारी जंगलतोड़ी और जैव विविधता का नुकसान। सेना की आवाजाही आसान करने के लिए या दुश्मन को छुपने की जगह न मिले, इसके लिए बड़े पैमाने पर जंगल खत्म कर दिए जाते हैं। इससे हजारों वन्यजीव बेघर हो जाते हैं और कई दुर्लभ जानवरों व पौधों की प्रजातियां खत्म होने की कगार पर पहुंच जाती हैं।

दूसरा है जल प्रदूषण और जमीन की बर्बादी। बम धमाकों और विस्फोटकों के इस्तेमाल से खतरनाक रसायन और भारी धातुएं (Heavy Metals) जमीन और जमीन के नीचे के पानी में घुल जाती हैं। इससे हजारों हेक्टेयर खेती की जमीन हमेशा के लिए बंजर हो जाती है। पीने का पानी जहरीला होने से वहां के लोगों में कैंसर और दूसरी गंभीर बीमारियां बढ़ती हैं।

संयुक्त राष्ट्र की साफ राय है कि प्राकृतिक संसाधनों की हिफाजत किए बिना दुनिया में सच्ची और लंबे समय तक टिकने वाली शांति कायम नहीं हो सकती। युद्ध खत्म होने के बाद जब कोई देश फिर से खड़ा होने की कोशिश करता है, तब उसे खेती, पानी और साफ हवा की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। अगर कुदरत की बुनियाद ही खोखली हो चुकी हो, तो वहां की अर्थव्यवस्था और आम जिंदगी कभी स्थिर नहीं हो सकती।

इसीलिए जलवायु संरक्षण (Climate Action), टिकाऊ विकास के लक्ष्य (SDGs) और पर्यावरणीय न्याय (Environmental Justice) को बढ़ावा देना आज के वक्त की जरूरत बन गया है। अगर हम आज युद्ध टालने और कुदरत का संतुलन बनाए रखने में नाकाम रहे, तो आने वाली पीढ़ियों को विरासत में रहने लायक साफ और सुरक्षित धरती नहीं दे पाएंगे।

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