वैंस की शर्त: ईरान 60% संवर्धित यूरेनियम क्यों रखे, वरना जंग जारी रहेगी
अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस ने कहा कि ईरान को अपनी परमाणु संवर्धन क्षमता में बड़ी कटौती करनी होगी, तभी जंग खत्म होगी।
तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं
मिडिल ईस्ट में तनाव दिन-ब-दिन पेचीदा होता जा रहा है। अमेरिका और ईरान के बीच पिछले सात महीने से सैन्य टकराव चल रहा है। इसे रोकने के लिए सियासी स्तर पर कोशिशें तो हो रही हैं, लेकिन अमन का रास्ता आसान नहीं दिख रहा। इसी बीच अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे.डी. वैंस ने ईरान के साथ जंग खत्म करने को लेकर बेहद सख्त बयान दिया है। अमेरिका ने शांति समझौते के लिए ईरान के सामने ऐसी शर्त रखी है, जिससे तेहरान के प्रशासन में भारी हलचल मच गई है।
एक खास इंटरव्यू में उपराष्ट्रपति वैंस ने साफ किया कि सात महीने पुरानी इस जंग को खत्म करने से पहले तेहरान को अपनी परमाणु संवर्धन क्षमता (Nuclear Enrichment Capacity) में बड़ी और अहम कमी करनी पड़ेगी। उनके मुताबिक अमेरिका कूटनीति और बातचीत के रास्ते से इस टकराव का हल निकालने को तैयार है। फिर भी सिर्फ जुबानी वादों या कागज पर दस्तखत करने से जंग नहीं रुकेगी। ईरान जमीन पर ठोस कदम उठाएगा, तभी अमेरिका जंगबंदी पर विचार करेगा।
ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर उसके दावों पर सवाल उठाते हुए वैंस ने सीधा और आक्रामक रुख अपनाया। उन्होंने कहा, "अगर ईरान का दावा है कि उसे परमाणु हथियार नहीं बनाने, तो फिर उसे 60% संवर्धित यूरेनियम ईंधन की जरूरत क्यों पड़ रही है?" उनकी दलील थी कि किसी भी सिविल एनर्जी प्रोजेक्ट के लिए इतने ऊंचे दर्जे के संवर्धित ईंधन की जरूरत नहीं होती। वैंस ने कहा कि अगर ईरान दुनिया को दिखाना चाहता है कि उसकी नीयत साफ है, तो उसे ज्यादा संवर्धित ईंधन का उत्पादन फौरन रोकना होगा।
वैंस ने जोर देकर कहा कि बातचीत में यही सबसे अहम और निर्णायक मुद्दा है। ईरान की परमाणु हथियार बनाने की क्षमता पर लगाम लगाना ट्रंप प्रशासन की मुख्य शर्त है। इसलिए जब तक ईरान खुद अपने परमाणु प्रोजेक्ट्स पर पाबंदी नहीं लगाता, तब तक शांति समझौता होना मुश्किल माना जा रहा है।
बीते कुछ हफ्तों में दोनों देशों ने इस टकराव को खत्म करने के लिए कुछ प्रस्ताव रखे थे। इनमें होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने का मुद्दा भी था। यह समुद्री रास्ता दुनिया के कारोबार के लिए बेहद अहम है और कच्चे तेल व ईंधन की ढुलाई के लिहाज से बहुत संवेदनशील माना जाता है।
इसके बावजूद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के हालिया शांति प्रस्ताव को सीधे ठुकरा दिया है। ट्रंप ने इशारों में चेतावनी दी है कि आने वाले नवंबर में होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद अमेरिका ईरान के खिलाफ अपनी सैन्य कार्रवाई और तेज कर सकता है। यानी कूटनीतिक बातचीत चल रही है, मगर असल जंग के मैदान में तनाव कम नहीं हुआ है।
अमेरिका के इस सख्त रुख और ईरान के साथ लंबी खिंचती जंग से अंतरराष्ट्रीय एनर्जी बाजार में बड़ी अनिश्चितता और अफरातफरी फैल गई है। ईंधन के दाम आसमान छूने से ट्रंप प्रशासन पर घरेलू सियासी दबाव लगातार बढ़ रहा है। अमेरिका में आने वाले मध्यावधि चुनावों में महंगाई और ईंधन के बढ़ते भाव सबसे अहम और संवेदनशील मुद्दा बनते जा रहे हैं।
दूसरी तरफ वॉशिंगटन के सामने एक और बड़ी दिक्कत यह है कि तेहरान में असली फैसले की ताकत किसके हाथ में है, इस पर अब भी तस्वीर साफ नहीं है। अमेरिकी अधिकारी ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान और विदेश मंत्री अब्बास अराघची के संपर्क में हैं। लेकिन ईरान की सत्ता और सर्वोच्च धार्मिक नेतृत्व के सामने इन नेताओं के अधिकार कितने असरदार हैं, इस पर जे.डी. वैंस ने शक जताया है। कुल मिलाकर अमेरिका की इन सख्त शर्तों के बाद ईरान सकारात्मक कदम उठाता है या टकराव और भड़कता है, यह आने वाला वक्त ही बताएगा।