सऊदी अरब की मदद को सैनिक भेजने की तैयारी में तुर्की, यमन में हौथियों से जंग जारी
दो सौ साल पुरानी दुश्मनी वाले तुर्की और सऊदी अरब यमन के मोर्चे पर एक साथ आ गए हैं। राष्ट्रपति एर्दोगान सऊदी को सैन्य मदद भेजने की तैयारी में हैं।
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मिडिल ईस्ट की राजनीति में एक बड़ा मोड़ दिख रहा है। तुर्की और सऊदी अरब के बीच करीब दो सदियों से राजनीतिक और ऐतिहासिक दुश्मनी चली आ रही है, लेकिन अब ये दोनों देश एक ही सैन्य मंच पर खड़े हैं। यमन में ईरान-समर्थित हौथी बागियों से बढ़ते सुरक्षा खतरे का सामना करने के लिए तुर्की के राष्ट्रपति रज्जब तय्यब एर्दोगान सऊदी अरब को बड़ी सैन्य मदद और सैनिक भेजने की तैयारी कर रहे हैं। इस फैसले से पूरे एशिया और मिडिल ईस्ट में सुरक्षा के समीकरण बदलने की संभावना बन गई है।
मिली जानकारी के मुताबिक आने वाले कुछ हफ्तों में तुर्की अपने अतिरिक्त लड़ाकू सैनिक, आपातकालीन रिस्पॉन्स टीमें और अत्याधुनिक तकनीकी रक्षा उपकरण सऊदी अरब में तैनात करेगा। मक्का रक्षा समझौते के तहत हाल ही में हुई एक अहम बैठक में तुर्की और पाकिस्तान, दोनों ने सऊदी अरब की सीमाओं और संप्रभुता की हिफाजत के लिए अपनी सेनाएं भेजने पर औपचारिक सहमति दी है। एक वरिष्ठ तुर्की अधिकारी ने बताया कि अंकारा सरकार इस मिशन के लिए हर तरह की तकनीकी और सैन्य मदद देने को प्रतिबद्ध है।
तुर्की का यह फैसला ऐसे वक्त आया है, जब यमन में सऊदी-समर्थित सरकारी सैनिकों ने हौथी बागियों के खिलाफ बड़ा सैन्य अभियान शुरू किया है। हौथियों ने हाल ही में जिस अहम इलाके पर कब्जा किया था, उसे वापस लेना और इलाके में उनकी पकड़ ढीली करना इस अभियान का मुख्य मकसद है। फिलहाल यमन में दोनों तरफ से भारी गोलीबारी और हमले चल रहे हैं। इस संघर्ष में अब तक 270 से ज्यादा सरकारी सैनिक और हौथी लड़ाके मारे जा चुके हैं। सऊदी अरब की वायुसेना पूरी लड़ाई के दौरान यमनी सैनिकों को हवा से सुरक्षा और मदद दे रही है।
इस सैन्य घटनाक्रम के पीछे 200 साल पुराना इतिहास है। आज सऊदी की हिफाजत के लिए आगे आ रहे तुर्की के ओटोमन खलीफा ने कभी सऊदी राजवंश को पूरी तरह मिटाने की कोशिश की थी। 18वीं सदी की शुरुआत में जब सौद बिन अब्दुलअजीज ने हिजाज प्रांत पर कब्जा किया, तो ओटोमन साम्राज्य और सऊदी की दिरिया अमीरात के बीच जंग छिड़ गई। साल 1813 में ओटोमन सेना ने हिजाज वापस ले लिया, पर दोनों राज्यों के बीच टकराव थमा नहीं।
साल 1814 में सौद बिन अब्दुलअजीज की मौत के बाद उनके बेटे अब्दुल्ला बिन सौद अल-सौद गद्दी पर बैठे। उन्हें मिस्र के शासक मुहम्मद अली पाशा और उनके बेटे इब्राहिम पाशा की अगुवाई वाली संयुक्त ओटोमन फौज के भारी हमले का सामना करना पड़ा। 1815 में मक्का और मदीना जैसे पवित्र शहर हाथ से निकलने के बाद सऊदी सेना को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद भी ओटोमन फौज आगे बढ़ती रही और सऊदी की राजधानी दिरिया को लगातार कई महीनों तक घेरे रखा।
आखिरकार 9 सितंबर 1818 को तीखे संघर्ष के बाद राजा अब्दुल्ला ने सरेंडर कर दिया। ओटोमनों ने सौद घराने के कई सदस्यों को फांसी दी, जबकि राजा अब्दुल्ला और उनके बच्चों को कैद करके मिस्र के रास्ते इस्तांबुल ले जाया गया। मिस्र के शासक ने उनके लिए माफी की गुजारिश की थी, लेकिन उस वक्त के ओटोमन खलीफा महमूद द्वितीय ने उसे ठुकरा दिया। मई 1819 में इस्तांबुल की मशहूर हागिया सोफिया के सामने राजा अब्दुल्ला और उनके समर्थकों का सरेआम सिर कलम कर दिया गया।
कुछ ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक फांसी से पहले राजा अब्दुल्ला को बेहद मानसिक यातना दी गई। अपने सख्त धार्मिक नियमों के चलते जिस राजा ने अपने राज्य में संगीत पर पूरी पाबंदी लगा रखी थी, उसे मौत से कुछ पल पहले संगीत सुनने पर मजबूर किया गया था। इस घटना के साथ पहले सऊदी साम्राज्य का पूरी तरह अंत हो गया था। आज वही इतिहास नए मोड़ पर है, क्योंकि 200 साल बाद ओटोमन साम्राज्य का वारिस तुर्की उसी सऊदी राजवंश की हिफाजत के लिए अपने सैनिक मैदान में उतार रहा है।