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उत्तराखंड के रवि तामटा ने बनाई बैटरी से उड़ने वाली सिंगल-सीटर गाड़ी, 13 साल की मेहनत

अल्मोड़ा के रवि तामटा ने बिना इंजीनियरिंग डिग्री के HAPIDA SKYNeX नाम का इलेक्ट्रिक उड़ने वाला वाहन बनाया है। अगस्त 2026 में उसका टेस्ट फ्लाइट कामयाब रहा।

उत्तराखंड के रवि तामटा ने बनाई बैटरी से उड़ने वाली सिंगल-सीटर गाड़ी, 13 साल की मेहनत तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

उत्तराखंड के एक नौजवान ने अपनी जिद के दम पर सबका ध्यान खींचा है। रवि तामटा के पास इंजीनियरिंग की कोई औपचारिक डिग्री नहीं है। फिर भी बताया जाता है कि उसने इंटरनेट की जानकारी और अपने खुद के प्रयोगों की मदद से 'HAPIDA SKYNeX' नाम का सिंगल-सीटर इलेक्ट्रिक उड़ने वाला वाहन तैयार किया है। करीब 13 साल की कोशिशों के बाद अगस्त 2026 में इस वाहन की टेस्ट फ्लाइट कामयाब रही।

दुनिया भर में इलेक्ट्रिक कार और उड़ने वाले वाहनों के क्षेत्र में नए-नए प्रयोग चल रहे हैं। इसी बीच रवि का नाम चर्चा में आया है।

रवि उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले के काफलीखान गांव का रहने वाला है। उसका बचपन जागेश्वर धाम इलाके में बीता। पहाड़ी इलाके में सफर की मुश्किलें उसने करीब से देखीं। तंग सड़कें, घुमावदार रास्ते और इमरजेंसी में अस्पताल तक पहुंचने में लगने वाला वक्त, इन सबको देखकर उसके मन में ऐसे वाहन का ख्याल आया जिसमें हवा से सफर किया जा सके।

मिली खबरों के मुताबिक रवि ने 2015 से इस आइडिया पर काम शुरू किया। उसके पिता हरिश राम मेकैनिक हैं। रवि ने नैनीताल से आर्ट्स की यानी BA की डिग्री ली है। साइंस या इंजीनियरिंग की पढ़ाई न होने के बावजूद उसने तकनीकी जानकारी के लिए इंटरनेट, ऑनलाइन ट्यूटोरियल और अपने प्रयोगों का सहारा लिया।

HAPIDA SKYNeX एक सीट वाला, बैटरी से चलने वाला प्रायोगिक हवाई वाहन है। इसकी बनावट में मल्टीरोटर ड्रोन की तरह कई मोटर और प्रोपेलर लगाए जाते हैं। इसलिए पुराने जहाज की तरह रनवे पर रफ्तार पकड़ने की जरूरत नहीं पड़ती। यह वाहन सीधे जमीन से ऊपर उठने के आइडिया पर टिका है।

ऐसा वाहन बनाते वक्त वजन, ऊपर उठाने की ताकत, हवा में संतुलन और कंट्रोल जैसी चुनौतियां अहम होती हैं। सिर्फ हवा में उड़ जाना काफी नहीं होता। यह भी परखना पड़ता है कि अलग-अलग हालात में वह सुरक्षित उड़ सकता है या नहीं।

रवि के HAPIDA SKYNeX प्रोटोटाइप ने अगस्त 2026 में अल्मोड़ा में टेस्ट फ्लाइट की। यह उड़ान स्थानीय प्रशासन की निगरानी में हुई। खबरों के मुताबिक टेस्ट के दौरान वाहन करीब 1 मिनट तक हवा में रहा। इससे रवि के बरसों के संघर्ष को एक अहम पड़ाव मिला।

लेकिन इस कामयाब टेस्ट का मतलब यह नहीं कि वाहन कमर्शियल इस्तेमाल के लिए तैयार है। बैटरी की क्षमता, एक चार्ज में कितनी दूरी तय होगी, ज्यादा से ज्यादा रफ्तार, कितना वजन या कितने यात्री ले जा सकता है और उड़ान का वक्त, इन सारी तकनीकी जानकारियों की अब तक अलग से जांच नहीं हुई है।

आगे चलकर हवा में चलने वाले ऐसे वाहन पहाड़ी इलाकों में आवाजाही, दूर-दराज के गांवों तक पहुंचने और मेडिकल इमरजेंसी में मदद पहुंचाने के काम आ सकते हैं। मगर इसके लिए वाहन की सुरक्षा साबित करनी होगी, और टेस्ट करने होंगे। नागर विमानन महानिदेशालय यानी DGCA समेत लागू नियामक संस्थाओं की जरूरी मंजूरी भी लेनी होगी।

कुल मिलाकर रवि तामटा की कहानी जिद, खुद सीखने और प्रयोग करने की मिसाल है। इंजीनियरिंग की डिग्री न होने पर भी उसने एक प्रायोगिक उड़ने वाला वाहन बनाकर दिखाया। अब सबकी नजर इस पर है कि यह आइडिया सुरक्षित, भरोसेमंद और असल में इस्तेमाल होने वाली तकनीक बन पाता है या नहीं।

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