उषा उथुप: स्कूल के संगीत क्लास से निकाली गई गायिका की आवाज आज पूरी दुनिया में मशहूर
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8 नवंबर 1947 को मुंबई में जन्मी उषा उथुप को भारी आवाज की वजह से स्कूल में संगीत क्लास से बाहर किया गया था। वही आवाज आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी।
बॉलीवुड के संगीत जगत में अपनी अलग पहचान बनाना किसी भी कलाकार के लिए आसान नहीं होता। इसके लिए बरसों की मेहनत, जिद और हुनर चाहिए। कुछ कलाकार ऐसे भी होते हैं, जिनकी जुदा पहचान ही उनकी कामयाबी की वजह बन जाती है। गायिका उषा उथुप ऐसी ही कलाकार हैं। अपनी भारी और दमदार आवाज से उन्होंने भारतीय संगीत में अपनी खास जगह बनाई है। दिलचस्प बात यह है कि जिस आवाज की वजह से वे आज दुनिया भर में जानी जाती हैं, उसी की वजह से कभी उन्हें स्कूल के संगीत क्लास से बाहर कर दिया गया था।
उषा उथुप का जन्म 8 नवंबर 1947 को मुंबई में एक तमिल परिवार में हुआ। उनका बचपन संगीत के माहौल में बीता। उनके माता-पिता को भारतीय शास्त्रीय संगीत के साथ पश्चिमी संगीत का भी शौक था, इसलिए बचपन से ही उषा को गाने का चस्का लग गया। उन्होंने मुंबई के बायकुला में सेंट एग्नेस हाई स्कूल में पढ़ाई की। स्कूल के दिनों में भी उन्हें गाना पसंद था, लेकिन उनकी आवाज बाकी लड़कियों से काफी अलग और भारी थी। इसी वजह से एक बार उन्हें स्कूल के संगीत क्लास से निकाल दिया गया था।
हालांकि उनके संगीत टीचर ने उनके अंदर का हुनर पहचान लिया था। इसलिए उन्हें गाने की जगह क्लैपर और त्रिकोण जैसे वाद्य बजाने का मौका दिया गया। संगीत की औपचारिक ट्रेनिंग न होने पर भी संगीत के प्रति उषा का प्यार कम नहीं हुआ।
उषा ने महज नौ साल की उम्र में पहली बार किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में गाना गाया। उनकी बहनों को भी संगीत का शौक था, और उन्हीं के जरिए उषा की मुलाकात मशहूर रेडियो एनाउंसर अमीन सयानी से हुई। सयानी ने उन्हें रेडियो सीलोन के कार्यक्रम 'ओवल्टीन म्यूज़िक आवर' में गाने का मौका दिया। इस कार्यक्रम में उन्होंने 'मॉकिंगबर्ड हिल' गाना पेश किया। यहीं से उनके संगीत के सफर की शुरुआत हुई।
पेशेवर गायिका के तौर पर उनका करियर 1969 में चेन्नई से शुरू हुआ। वहां उन्होंने 'नाइन जेम्स' नाम के नाइट क्लब में गाना शुरू किया। उनके पहले ही कार्यक्रम को दर्शकों से बेहतरीन रिस्पॉन्स मिला, जिसके बाद क्लब के मालिक ने उन्हें लगातार एक हफ्ते तक गाने का मौका दिया। फिर उन्होंने कोलकाता, दिल्ली और मुंबई के कई नाइट क्लबों में अपने कार्यक्रम किए। कोलकाता में ही उनकी मुलाकात जानी चाको उथुप से हुई, और आगे चलकर दोनों ने शादी कर ली।
नाइट क्लबों के बाद उषा उथुप ने बॉलीवुड में भी अपनी आवाज का जादू दिखाया। उन्होंने 1970 में फिल्म 'बॉम्बे टॉकी' से प्लेबैक सिंगिंग की शुरुआत की। इसके बाद उन्होंने 'हरे रामा हरे कृष्णा' फिल्म के लिए भी गाने गाए। उन्हें आर. डी. बर्मन और बप्पी लाहिड़ी जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम करने का मौका मिला।
'रंभा हो हो हो', 'मेहबूबा मेहबूबा' और 'डार्लिंग' जैसे गानों ने उन्हें जबरदस्त लोकप्रियता दिलाई। पॉप, जैज़, रॉक और फिल्म संगीत जैसी कई विधाओं में उन्होंने अपनी आवाज की छाप छोड़ी। जिस आवाज की वजह से कभी उन्हें स्कूल का संगीत क्लास छोड़ना पड़ा था, उसी ने आगे चलकर संगीत की दुनिया में उन्हें अलग पहचान दिलाई। आज उषा उथुप का सफर कई नए गायकों के लिए प्रेरणा माना जाता है।


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