शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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त्रिशूर के नेल्लुवाई में धन्वंतरी का पांच हजार साल पुराना मंदिर, मुक्कुडी प्रसाद के लिए मशहूर

कल्चर PT24 टीम

केरल के त्रिशूर जिले के नेल्लुवाई में श्री धन्वंतरी मंदिर है, जिसे भगवान धन्वंतरी के सबसे पुराने और अहम मंदिरों में गिना जाता है।

केरल के त्रिशूर जिले में नेल्लुवाई (Nelluvai) नाम की जगह पर श्री धन्वंतरी मंदिर है। भगवान धन्वंतरी को आरोग्य और आयुर्वेद का देवता माना जाता है, और देश में उनके जो बहुत पुराने और खास मंदिर गिने जाते हैं, उनमें यह भी एक है।

बताया जाता है कि यह मंदिर 5000 साल से ज्यादा पुराना है। मान्यता है कि यहां की मुख्य मूर्ति अश्विनी देवों ने स्थापित की थी। द्वापार युग में भगवान श्रीकृष्ण के पिता वसुदेव ने इसी मूर्ति की पूजा की थी, ऐसी कथा चलती है। इसी वजह से मंदिर का इतिहास 5,000 साल से भी पुराना होने का अंदाजा लगाया जाता है।

समुद्रमंथन के बाद भगवान धन्वंतरी हाथ में अमृत का कलश, शंख, चक्र, गदा और जलोका लेकर प्रकट हुए थे। यहां वे पश्चिम की ओर मुंह वाले मंदिर में 'आदि धन्वंतरी' के रूप में विराजमान हैं। इस मंदिर को दुनियाभर में मशहूर गुरुवायूर के श्रीकृष्ण मंदिर से आध्यात्मिक तौर पर जुड़ा हुआ माना जाता है।

मुख्य देवता भगवान धन्वंतरी पश्चिम की तरफ मुंह करके खड़े हैं। मुख्य मंदिर के परिसर में शिव, गणपति, अय्यप्पा, वराह मूर्ति (चेरुतेवर / महाविष्णु) और सर्पदेवता के भी मंदिर हैं। ये यहां के उपमंदिर हैं।

गांव के नाम के पीछे भी एक बात है। मंदिर के पश्चिम की तरफ हरे-भरे धान के खेत फैले हैं, और इन्हीं से गांव को 'नेल्लुवाई' (Nelluvai) नाम मिला।

इस मंदिर का 'मुक्कुडी' (Mukkudi) नाम का औषधीय प्रसाद बहुत मशहूर है। यह खास आयुर्वेदिक काढ़ा या प्रसाद हर दिन एक तय गुप्त नुस्खे से कुट्टनचेरी मनु मूस (Kuttancherry Manu Mooss) की देखरेख में तैयार होता है। पेट की बीमारियों, त्वचा के रोगों और कई पुराने रोगों से राहत पाने के लिए श्रद्धालु इस प्रसाद को लेते हैं।

उत्सवों की बात करें तो धनुमासम में आने वाली स्वर्गवातिल एकादशी इस मंदिर का सबसे बड़ा उत्सव है। इसके अलावा धन्वंतरी जयंती (धन त्रयोदशी) और तुलामसम में निलमाला महोत्सव भी बड़े उत्साह से मनाए जाते हैं। केरल के कई आयुर्वेदिक वैद्य (Vaidyas) अपना काम शुरू करने से पहले यहां आकर पाठ और भजन करते हैं। कहा जाता है कि इससे उन्हें भगवान का आशीर्वाद मिलता है।

यहां पहुंचने के लिए त्रिशूर रेलवे स्टेशन से मंदिर की दूरी करीब 24 से 25 किलोमीटर है। कोचीन अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से दूरी लगभग 74 से 76 किलोमीटर है। यानी रेलवे और हवाई, दोनों रास्तों से यहां आया जा सकता है और भगवान के दर्शन किए जा सकते हैं।

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