शुक्रवार, 6 नवंबर 2026

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नागपुर में आशा पारेख ने ताजा कीं पुरानी यादें, 'दीपसंध्या' में किस्सों और गानों की महफिल सजी

कल्चर PT24 टीम

शिवाजी नगर उद्यान में गुरुवार को हुए 'कुछ यादें कुछ नगमे' कार्यक्रम में अभिनेत्री आशा पारेख ने फिल्मी सफर, लता मंगेशकर और शूटिंग के पुराने दिनों के किस्से सुनाए।

वरिष्ठ अभिनेत्री आशा पारेख की फिल्मी करियर की यादों, पुरानी हिंदी फिल्मों के दिलचस्प किस्सों और बेमिसाल गानों ने गुरुवार की शाम नागपुर वालों के लिए यादगार बना दी। शिवाजी महाराज कृती समिति की तरफ से शिवाजी नगर उद्यान में सांस्कृतिक समारोह 'दीपसंध्या' रखा गया था। इसमें 'कुछ यादें कुछ नगमे' नाम का खास कार्यक्रम हुआ। आशा पारेख के आने से इसकी अहमियत और बढ़ गई थी और बड़ी संख्या में संगीत प्रेमी पहुंचे थे।

मशहूर शेफ विष्णु मनोहर ने आशा पारेख से बातचीत की। इसमें उनके बचपन से लेकर हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में कामयाब सफर तक की कई यादें सामने आईं। नागपुर से अपने पुराने रिश्ते के बारे में उन्होंने बताया कि उनकी दो मौसियां नागपुर में रहती थीं, इसलिए आठ-नौ साल की उम्र में वे अक्सर यहां आती थीं। इसके बाद भी दो बार नागपुर आना हुआ। राजेश खन्ना के गानों पर आधारित एक कार्यक्रम के लिए आई थीं, वह नागपुर की उनकी आखिरी यात्रा थी।

पुराने जमाने में फिल्मों की शूटिंग कितनी मुश्किल होती थी, इस पर भी उन्होंने अपना अनुभव बताया। उस दौर में रिफ्लेक्टर की रोशनी बहुत तेज होती थी, जिससे आंखों में तकलीफ होती और गॉगल लगाना पड़ता था। मगर गॉगल की वजह से लोग समझ बैठते थे कि उन्होंने शराब पी रखी है। यह मजेदार किस्सा भी उन्होंने सुनाया।

बचपन में वे लड़कों के साथ खेलने वाली और उन्हीं की तरह रहने वाली 'टॉमबॉय' किस्म की लड़की थीं, यह भी उन्होंने बताया। शम्मी कपूर के साथ के अनुभव, मालवणी स्टाइल की फिश करी और खाने-पीने की अपनी पसंद पर भी उन्होंने खुलकर बातें कीं।

आज के संगीत पर जताया अफसोस

हिंदी फिल्म संगीत में आए बदलावों पर बोलते हुए आशा पारेख ने कहा कि आज के गानों में शास्त्रीय संगीत का असर पहले के मुकाबले कम हो गया है। इस बात का उन्होंने अफसोस जताया। उनके मुताबिक पुराने गानों में मिठास के साथ मतलब भी होता था। संगीत की समृद्ध परंपरा अगली पीढ़ी तक पहुंचना जरूरी है, यह बात भी उन्होंने रखी। इस मौके पर संगीत क्षेत्र में योगदान देने वाले निरंजन बोबडे की उन्होंने खास तारीफ की।

स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को याद करते हुए उन्होंने लताजी की गायकी के मुश्किल आलापों का जिक्र किया। उन्होंने कहा, "लताजी यानी साक्षात सरस्वती थीं। उनके सुरों को अपनाना आसान नहीं था।" इन शब्दों में उन्होंने अपना आदर जताया।

पुराने गानों से जमा रंग

आशा पारेख की यादों को संगीत का साथ मिला तो महफिल और जम गई। मशहूर गायक निरंजन बोबडे की संकल्पना से बने इस कार्यक्रम में निरंजन बोबडे और महेंद्र ढोले के संगीत संयोजन में 30 कलाकारों की टीम ने हिंदी फिल्मों के लोकप्रिय गाने पेश किए।

मकरंद पाटणकर ने 'श्याम मस्तानी', मंजिरी वैद्य ने 'रात का समा', धनश्री देशपांडे ने 'सुनो सजना', निरंजन बोबडे ने 'तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है' और गौरी शिंदे ने 'ओ मेरी सोना रे सोना रे' गाकर श्रोताओं की दाद बटोरी। 'ये दुनिया वाले पूछेंगे' जैसे युगल गीतों ने भी महफिल में रंग भरा।

'आजा आजा' की शूटिंग का किस्सा

फिल्म 'तीसरी मंजिल' के लोकप्रिय गाने 'आजा आजा' की शूटिंग के दौरान आई दिक्कतें भी आशा पारेख ने याद कीं। शूटिंग वाले दिन उन्हें एलर्जी हो गई थी। दोपहर दो बजे शूटिंग थी, इसलिए दवा लेकर भी उन्हें काम पूरा करना पड़ा। उन्होंने साफ किया कि कलाकार की तबीयत ठीक न हो या बुखार हो, तब भी अक्सर शूटिंग रोकी नहीं जा सकती।

उन्होंने बताया कि पहले आउटडोर शूटिंग में टॉयलेट जैसी बुनियादी सुविधाएं तक नहीं होती थीं। पूरा दिन बहुत मुश्किल हालात में काम करना पड़ता था। आज कलाकारों को वैनिटी वैन जैसी सुविधाएं मिलती हैं, यह कहकर उन्होंने पुराने और नए दौर की शूटिंग का फर्क बताया।

महाराष्ट्र में रहकर मराठी आनी ही चाहिए

नागपुर वालों के दिल से किए गए स्वागत से आशा पारेख भावुक दिखीं। उन्होंने महाराष्ट्र से अपने रिश्ते की बात भी की। महाराष्ट्र में जन्म हुआ है, इसलिए मराठी बोलना आना ही चाहिए, यह उन्होंने मराठी में ही कहा। राज्य की समृद्ध साहित्यिक परंपरा की भी उन्होंने तारीफ की।

कार्यक्रम के आयोजन में शिवाजी महाराज कृती समिति के अध्यक्ष अजय संचेती, उपाध्यक्ष संगीत चौहान और विनय अग्रवाल, सचिव श्रीकांत देशपांडे, सहसचिव अश्विन राऊत, कोषाध्यक्ष वंदना कुल्हार समेत समिति के सदस्यों की अहम भूमिका रही। विधायक अभिजीत वंजारी, विलास काळे, एड. आनंद परचुरे, रवींद्र कासखेडीकर, संजय पेंडसे सहित कई गणमान्य लोग मौजूद थे।

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