नागपुर में आशा पारेख ने सुनाए बचपन और फिल्मी सफर के किस्से, 'दीपसंध्या' में सजी गीतों की शाम
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शिवाजीनगर उद्यान में 'कुछ यादें कुछ नगमे' कार्यक्रम हुआ। पद्मश्री और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित आशा पारेख ने बचपन, शूटिंग और नागपुर से जुड़ी यादें साझा कीं।
नागपुर के शिवाजीनगर उद्यान में 'दीपसंध्या' के तहत हुए सांस्कृतिक कार्यक्रम 'कुछ यादें कुछ नगमे' में दिग्गज अभिनेत्री आशा पारेख ने अपने अभिनय सफर की कई दिलचस्प यादें साझा कीं। पद्मश्री और दादासाहेब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित पारेख की मौजूदगी ने दर्शकों को हिन्दी सिनेमा के स्वर्णिम दौर की याद दिला दी।
कार्यक्रम का आयोजन शिवाजी महाराज कृति समिति ने किया था। मंच पर शेफ विष्णु मनोहर ने आशा पारेख से बातचीत की और उनके बचपन से लेकर फिल्मी सफर तक की यादें टटोलीं।
नागपुर से अपने पुराने जुड़ाव का जिक्र करते हुए पारेख ने बताया कि उनकी 2 मौसियां नागपुर में रहती थीं। इसी वजह से जब वह 8-9 साल की थीं, तब अक्सर यहां आया करती थीं। उसके बाद भी उन्हें 2 बार नागपुर आने का मौका मिला। उन्होंने बताया कि राजेश खन्ना के गानों पर हुआ एक कार्यक्रम नागपुर में उनका आखिरी कार्यक्रम था।
बचपन के बारे में पारेख ने कहा कि वह लड़कों के साथ खेलने वाली 'टॉमबॉय' स्वभाव की लड़की थीं। इसके अलावा उन्होंने शम्मी कपूर के साथ काम करने के अपने अनुभव पर बात की। मालवणी स्टाइल की फिश करी और अपनी पसंदीदा खाने की चीजों का भी जिक्र आया।
पुराने जमाने की शूटिंग की मुश्किलों पर बोलते हुए आशा पारेख ने बताया कि उस दौर में रिफ्लेक्टर की रोशनी बहुत तेज होती थी। इससे आंखों को तकलीफ होती थी और चश्मा पहनना पड़ता था, लेकिन लोग समझ लेते थे कि उन्होंने शराब पी रखी है।
फिल्म 'तीसरी मंजिल' के मशहूर गीत 'आजा आजा' की शूटिंग का किस्सा भी उन्होंने सुनाया। पारेख के मुताबिक उस गाने की शूटिंग के वक्त उन्हें एलर्जी हो गई थी। शूटिंग दोपहर 2 बजे थी और दवा लेने के बाद भी उन्हें काम करना पड़ा। उन्होंने कहा कि कलाकार को बुखार हो या तबीयत ठीक न हो, फिर भी काम करना पड़ता है, इसीलिए कलाकार, कलाकार होता है।
आत्मीय स्वागत पर खुशी जताते हुए आशा पारेख ने मराठी भाषा में कहा कि उनका जन्म महाराष्ट्र राज्य में हुआ है, इसलिए मराठी बोलना आना ही चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने महाराष्ट्र की समृद्ध साहित्यिक परंपरा की खुलकर तारीफ की।
कार्यक्रम का संगीत वाला हिस्सा भी खास रहा। गायक निरंजन बोबडे की संकल्पना पर और बोबडे और महेंद्र ढोले के संगीत संयोजन में 30 कलाकारों की टीम ने सदाबहार हिन्दी फिल्मी गीत पेश किए। इस तरह यह शाम यादों और सुरीले नगमों दोनों से सजी रही।
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