ठाणे के किम्स हॉस्पिटल्स में ब्रेन-स्टेम डेड 43 साल के शख्स का लिवर और दोनों किडनी दान
ठाणे के किम्स हॉस्पिटल्स में ब्रेन-स्टेम डेड घोषित 43 साल के शख्स के परिवार ने अंगदान का फैसला किया। लिवर और दोनों किडनी निकाली गईं और ZTCC मुंबई के जरिए बांटी गईं।
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ठाणे के किम्स हॉस्पिटल्स में एक परिवार ने अपनों को खोने के सबसे मुश्किल वक्त में भी दूसरों के बारे में सोचा। अस्पताल में ब्रेन-स्टेम डेड घोषित किए गए 43 साल के शख्स के घरवालों ने उनके अंग दान करने का फैसला लिया। इस फैसले से अंग प्रत्यारोपण का इंतजार कर रहे मरीजों को नई जिंदगी की उम्मीद मिली है। उनका लिवर और दोनों किडनी कामयाबी से निकाली गईं और झोनल ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेशन सेंटर (ZTCC), मुंबई के जरिए उनका बंटवारा किया गया।
इस परिवार के फैसले के पीछे किम्स हॉस्पिटल्स में हुआ एक अंगदान जागरूकता सत्र भी था। परिवार के लोग उस सत्र में मौजूद थे। वहां उन्हें मौत के बाद अंगदान, ब्रेन-स्टेम डेथ और अहम अंग दान करने से प्रत्यारोपण के इंतजार में बैठे मरीजों की किस तरह मदद होती है, इसकी जानकारी दी गई थी। कुछ वक्त बाद जब उन पर अपने प्यारे इंसान को खोने की घड़ी आई, तो उस सत्र की बात उन्हें याद रही और उसी से उन्हें अंगदान के बारे में सोचने की प्रेरणा मिली।
मरीज को पहले उल्टियां हुईं, फिर अचानक वे बेहोश हो गए और उनका ब्लड प्रेशर बहुत बढ़ गया था। इसलिए उन्हें सबसे पहले दूसरे अस्पताल में भर्ती किया गया। बेहोशी गहरी होने और सांस लेने में तकलीफ की वजह से उन्हें इंट्युबेट करना पड़ा। वहां हुए CT स्कैन में बाएं थैलेमो-कैप्स्युलर हिस्से में गंभीर इंट्रासेरेब्रल हैमरेज दिखा। यह ब्लीडिंग वेंट्रिकल वाले हिस्से तक फैल चुकी थी। इसके अलावा एक्यूट हायड्रोसेफेलस था और दिमाग की मध्यरेखा में काफी बदलाव (significant midline shift) पाया गया। आगे के इलाज और निगरानी के लिए उन्हें किम्स हॉस्पिटल्स, ठाणे में shift किया गया।
किम्स हॉस्पिटल्स में मरीज को फौरन न्यूरोसर्जिकल इलाज मिला। साथ ही गहन न्यूरोलॉजिकल केयर, वेंटिलेटर का सहारा और लगातार न्यूरोलॉजिकल मॉनिटरिंग भी दी गई। मेडिकल टीम लगातार इलाज करती रही, फिर भी उनकी न्यूरोलॉजिकल हालत धीरे-धीरे बिगड़ती गई। बाद की क्लिनिकल जांच में ब्रेन-स्टेम रिफ्लेक्सेस गायब मिले। तय मेडिकल प्रक्रिया के हिसाब से जरूरी जांचें की गईं। दो बार की गई अप्निया टेस्ट में अपेक्षित सकारात्मक नतीजे मिलने के बाद 22 सितंबर 2026 को ब्रेन-स्टेम डेथ घोषित की गई।
मेडिकल टीम से काउंसलिंग और बातचीत के बाद परिवार ने मौत के बाद अंगदान के लिए मंजूरी दे दी। उसी के मुताबिक लिवर और दोनों किडनी कामयाबी से निकाली गईं। Transplantation of Human Organs and Tissues Act and Rules के प्रावधानों के तहत इन अंगों के बंटवारे की प्रक्रिया ZTCC, मुंबई के तालमेल से पूरी की गई।
किम्स हॉस्पिटल्स के रिजनल डायरेक्टर डॉ. सौरभ गुप्ता ने कहा, "अपने प्यारे इंसान की अचानक हुई मौत का सामना कर रहे परिवार के लिए अंगदान का फैसला लेना बड़ी हिम्मत का काम होता है। इस फैसले की खास अहमियत इसलिए है कि इस परिवार को ऐसे हालात का सामना करने से पहले ही अंगदान की जागरूकता की जानकारी मिल चुकी थी। उन्होंने जो संदेश सुना था, वह उनके मन में रह गया और गहरे दुख की घड़ी में उन्हें अंगदान के जरिए दूसरों को उम्मीद देने का रास्ता दिखा। उनका यह फैसला बेहद संवेदनशील है और इंसानियत की मिसाल है। साथ ही यह इस बात की भी याद दिलाता है कि सही वक्त पर मिली जागरूकता परिवारों को अहम घड़ी में जानकारी के साथ फैसला लेने के लिए कैसे प्रेरित कर सकती है।"
उन्होंने आगे कहा, "अंगदान का आखिरी मकसद दूसरे इंसान को जीने का मौका देना है। प्यारे इंसान का नुकसान कभी भरा नहीं जा सकता, लेकिन परिवार ने अंगदान का जो फैसला लिया, वह उस इंसान की विरासत को दूसरों की जिंदगी में आगे जारी रख सकता है। हमारी उम्मीद है कि ज्यादा से ज्यादा लोग ब्रेन-स्टेम डेथ और मौत के बाद के अंगदान की अहमियत समझें, ताकि और परिवार सही जानकारी के आधार पर फैसला ले सकें।"
इस मामले से मौत के बाद अंगदान के बारे में लगातार जागरूकता फैलाने की अहमियत भी सामने आती है। ब्रेन-स्टेम डेथ की वक्त पर पहचान, परिवार की संवेदनशील काउंसलिंग और प्रत्यारोपण से जुड़े प्राधिकरणों के साथ सही तालमेल, ये तीनों बातें अंगदान की प्रक्रिया को सुचारू रखने के लिए बहुत जरूरी हैं।
इस परिवार के फैसले से एक बेहद दुखद घड़ी दूसरों को जिंदगी का मौका देने की उम्मीद में बदल गई। यह फैसला याद दिलाता है कि बहुत कठिन वक्त में भी इंसानियत और करुणा उम्मीद की किरण जगा सकती है, और एक इंसान की जिंदगी खत्म हो जाने पर भी उसके अंग कई और लोगों को नए सिरे से जीने का मौका दे सकते हैं।