मुंबई और ठाणे की 9 दुर्गापूजा, जहां मंडप, मूर्तियां और बंगाली खाना खींच लाता है
नवरात्रि में मुंबई और ठाणे की दुर्गापूजा अपने चरम पर होती है। कुलाबा से बोरिवली तक नौ पूजाओं की जानकारी।
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नवरात्रि के दिनों में मुंबई और ठाणे में दुर्गापूजा (Durgapuja) का जोश चरम पर पहुंच जाता है। भव्य मंडप, देवी की आकर्षक मूर्तियां, पारंपरिक बंगाली पूजा, सांस्कृतिक कार्यक्रम और लजीज बंगाली खाने की वजह से इस उत्सव में खास रंग आ जाता है। इस बार मुंबई और ठाणे की इन 9 मशहूर दुर्गापूजाओं में जाया जा सकता है।
पहली पूजा कुलाबा हिल की बॉम्बे दुर्गाबारी समिति की है। यह मुंबई की सबसे पुरानी दुर्गापूजाओं में गिनी जाती है। 1930 में शुरू हुई यह पूजा आज भी पारंपरिक बंगाली तरीके से होती है। देवी की मूर्ति कोलकाता के एक कलाकार से खास तौर पर बनवाई जाती है। 90 साल से ज्यादा की परंपरा निभाने वाली यह पूजा आज भी कई लोगों के लिए खास आकर्षण है।
दूसरी पूजा माटुंगा के SNDT महिला महाविद्यालय में होने वाली होई चोई आनंदो फाउंडेशन की दुर्गापूजा है। इस बार पारंपरिक पूजा के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम और लाइव मनोरंजन भी रखा गया है। मशहूर गायक जावेद अली का लाइव कार्यक्रम इस साल का खास आकर्षण होगा।
तीसरी पूजा वाशी में नवी मुंबई बंगाली असोसिएशन की है, जो 1981 से दुर्गापूजा मनाती आ रही है। यहां सिर्फ पूजा नहीं होती, बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम भी होते हैं। 'शारदोत्सव' में संगीत, नृत्य और नामी कलाकारों के कार्यक्रम जमते हैं। नवी मुंबई के बंगाली समाज को एक साथ लाने वाला यह उत्सव हर साल बड़े उत्साह से मनाया जाता है।
चौथी पूजा दादर के द बंगाल क्लब की है, जो मुंबई की पुरानी परंपराओं में गिनी जाती है। पारंपरिक पूजा, सुंदर सजावट, संगीत और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने इसे अलग पहचान दी है। बंगाली समाज के साथ दूसरे लोग भी यहां आते हैं। कुछ मशहूर बॉलीवुड कलाकार भी इसमें शामिल होते हैं।
पांचवीं पूजा ठाणे का आमरा प्रवासी दुर्गोत्सव है। इसकी शुरुआत 2000 में सिर्फ 14 बंगाली परिवारों ने की थी। हिरानंदानी एस्टेट में छोटे स्तर पर शुरू हुआ यह उत्सव अब ठाणे की मशहूर दुर्गापूजाओं में है। इसकी खासियत है कि समाज के हर किसी को शामिल करने की कोशिश होती है। स्थानीय कलाकारों, घरेलू कारोबारियों और युवा कलाकारों को भी यहां अपनी कला दिखाने का मौका मिलता है। सप्तमी, अष्टमी और नवमी को मिलने वाला बंगाली भोग भी इस पूजा का खास आकर्षण है।
छठी पूजा जुहू की नॉर्थ बॉम्बे सार्वजनीन दुर्गापूजा है। मुंबई की जानी-मानी हस्तियों और कलाकारों की मौजूदगी से इसे अलग पहचान मिली है। यह पूजा 1948 में शुरू हुई थी। फिल्म निर्माता शशधर मुखर्जी, उनकी पत्नी और सांताक्रूज के कुछ लोगों ने मिलकर इसे शुरू किया था। आज भी मुखर्जी परिवार का इस उत्सव से करीबी नाता है। काजोल और रानी मुखर्जी जैसे कलाकारों की वजह से भी यह पूजा हर साल चर्चा में रहती है। कोलकाता से लाई जाने वाली देवी की मूर्ति भी यहां का खास आकर्षण है।
सातवीं पूजा खार के रामकृष्ण मिशन की है। भीड़, बड़ी सजावट और मनोरंजन के बजाय पारंपरिक पूजा और शांत माहौल चाहिए, तो यहां जाया जा सकता है। यहां पूजा और भक्ति को खास अहमियत दी जाती है। महाअष्टमी को होने वाली 'कुमारी पूजा' यहां की खासियत है, जिसमें छोटी बच्चियों में देवी का रूप देखकर उनकी पूजा की जाती है।
आठवीं पूजा पवई की हिरानंदानी गार्डन्स में होने वाली पवई बंगाली वेलफेयर असोसिएशन की है। हर साल बड़े उत्साह से मनाई जाने वाली इस पूजा में बड़ी सजावट, अलग-अलग सांस्कृतिक कार्यक्रम और उत्सव का माहौल देखने हजारों लोग आते हैं। पिछले कुछ सालों में पवई की दुर्गापूजा मुंबई की लोकप्रिय दुर्गापूजाओं में शामिल हो गई है।
नौवीं पूजा बोरिवली की संस्कृती दुर्गापूजा है, जिसकी शुरुआत 1953 में हुई। शुरू में बोरिवली में रहने वाले कुछ बंगाली परिवारों ने यह परंपरा शुरू की थी। आज सात दशक से ज्यादा समय से यह पूजा चल रही है। 2025 में इसे बोरिवली पूर्व के कुलुपवाडी में BMC Garden में ले जाया गया। जगह बदल गई, पर पुरानी परंपरा और जोश आज भी वैसे ही हैं।
मुंबई में दुर्गापूजा सिर्फ देवी की पूजा नहीं है। यह परंपरा, संस्कृति, संगीत, खान-पान और साथ आने का उत्सव है। इस नवरात्रि इन जगहों पर जाकर उत्सव का अलग अनुभव लिया जा सकता है।