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05:30 IST

सूखे में मवेशी बचाने के लिए चारे के इंतज़ाम को दें सबसे पहली तरजीह

चंद्रपुर जिले में सूखे के हालात को देखते हुए कृषि विज्ञान केंद्र, सिंदेवाही की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सोनाली दुपटे ने किसानों और पशुपालकों से अभी से चारे का सही इंतज़ाम करने की अपील की है।

सूखे में मवेशी बचाने के लिए चारे के इंतज़ाम को दें सबसे पहली तरजीह तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

चंद्रपुर जिले में सूखे के हालात बने हुए हैं। ऐसे में मवेशियों को बचाने और चारे की संभावित कमी से निपटने के लिए किसानों और पशुपालकों को अभी से चारे का सही इंतज़ाम करना ज़रूरी है। कृषि विज्ञान केंद्र, सिंदेवाही की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सोनाली दुपटे ने यह अपील की है। उनका कहना है कि मौजूद चारे का अच्छे से इस्तेमाल, फसलों के अवशेषों पर प्रक्रिया, साइलेज बनाना, अज़ोला की खेती और संतुलित पशुआहार से चारे की कमी की मार काफ़ी घटाई जा सकती है। इसके लिए किसान वैज्ञानिक तरीके अपनाएं।

हरे और सूखे चारे के लिए किसान मौजूद चारे को बर्बाद होने से बचाएं और उसका ठीक से हिसाब रखें। चारे की कुट्टी करके खिलाने से करीब 20 से 25 प्रतिशत तक बचत हो सकती है। घटिया क्वालिटी के सूखे चारे पर वैज्ञानिक तरीके से प्रक्रिया की जाए तो वह आसानी से पचता है और उसकी खुराक की क्वालिटी भी बेहतर होती है।

फसलों के अवशेषों से पौष्टिक चारा बनाया जा सकता है। धान का पुआल, गेहूं का डंठल, मक्के के अवशेष, सोयाबीन का भूसा, कपास के डंठल और अरहर का भूसा चारे के तौर पर काम आ सकते हैं। सोयाबीन के भूसे में प्रोटीन तुलना में ज़्यादा होता है, फिर भी सही प्रक्रिया करने पर वह नरम और ज़्यादा काम का बन जाता है। इसी तरह धान के पुआल पर प्रक्रिया करके उसकी पाचन क्षमता बढ़ाई जा सकती है। कपास के डंठल को जलाने के बजाय सुरक्षित और वैज्ञानिक तरीके से चारे के इंतज़ाम में इस्तेमाल करने की गुंजाइश परखनी चाहिए।

यूरिया प्रक्रिया वाला चारा बनाते समय खास सावधानी ज़रूरी है। यूरिया की मात्रा, चारे की क्वालिटी, प्रक्रिया की अवधि और जानवरों की उम्र के हिसाब से यह काम पशु चिकित्सा अधिकारी या पशुपोषण विशेषज्ञ की देखरेख में ही हो। ऐसा चारा छोटे बछड़ों को और उन जानवरों को न दें जिनमें पाचन क्षमता ठीक से विकसित नहीं हुई है। फफूंद लगा, सड़ा हुआ या गंदा चारा किसी भी हाल में जानवरों को न खिलाएं।

सूखे के दौरान हरे चारे की कमी पूरी करने के लिए साइलेज अच्छा विकल्प हो सकता है। हरे मक्के या ज्वार जैसी चारा फसलों को सही अवस्था में काटें और उनकी बारीक कुट्टी करें। फिर इस कुट्टी को साइलेज के गड्ढे, सीमेंट की टंकी या खास साइलेज बैग में हवाबंद तरीके से रखें। ठीक से बना साइलेज करीब 45 से 50 दिन में जानवरों को खिलाने लायक हो जाता है। इससे हरे चारे के ज़रूरी पोषक तत्व बचे रहते हैं, गर्मी में और चारे की किल्लत के वक्त जानवरों को रसीला चारा मिल पाता है, और दूध का उत्पादन बनाए रखने में भी मदद मिलती है।

अज़ोला पानी पर उगने वाला प्रोटीन से भरपूर पौधा है, जो जानवरों के पूरक आहार के काम आता है। इसके लिए छांव वाली जगह पर पानी की टंकी या प्लास्टिक की परत वाला गड्ढा बनाएं और उसमें सही मात्रा में पानी, पोषक तत्व और अज़ोला कल्चर डालें। अनुकूल हालात में करीब 15 से 18 दिन में अज़ोला बढ़ जाता है और कटाई शुरू हो सकती है। इसमें प्रोटीन, विटामिन और कई खनिज होते हैं, इसलिए गाय, भैंस, बकरी और मुर्गीपालन में पूरक खुराक के तौर पर इसका इस्तेमाल हो सकता है।

पानी की उपलब्धता देखकर अक्टूबर और नवंबर में ल्यूसर्न, बरसीम और ओट जैसी चारा फसलों की बुआई की योजना बनानी चाहिए। अनुकूल हालात में इन फसलों की पहली कटाई करीब 45 से 60 दिन में होती है और आगे की कटाई 25 से 30 दिन के अंतर पर की जा सकती है। जिन इलाकों में पानी की किल्लत है, वहां मौजूद पानी का ध्यान रखकर ही चारा फसल चुनें।

गांव के स्तर पर भी चारे का इंतज़ाम ज़रूरी है। किसान फसलों के अवशेष जलाएं नहीं, उनका सही इस्तेमाल करें। जहां मुमकिन हो वहां मिलकर चारा जमा करने, साइलेज बनाने और चारे के प्रबंधन की योजना बनाएं। चारे की कमी के डर से पशुपालक जल्दबाज़ी में जानवर बेचने का फैसला न लें। चारे के दूसरे स्रोत इस्तेमाल करके मवेशियों को बचाने को तरजीह दें।

ज़्यादा जानकारी के लिए पास के पशु चिकित्सालय, कृषि विभाग या कृषि विज्ञान केंद्र, सिंदेवाही से संपर्क करें। यह अपील कृषि विज्ञान केंद्र की ओर से की गई है।

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