रावेर तालुका में नौ महीनों में 95 महिलाएं और लड़कियां लापता, 88 लौटीं
जनवरी से सितंबर 2026 के बीच निंभोरा, रावेर और सावदा पुलिस स्टेशनों की हद में दर्ज हुए मामलों में 17 नाबालिग लड़कियां भी शामिल हैं।
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जलगांव जिले के रावेर तालुका से महिलाओं और लड़कियों के लापता होने के आंकड़े सामने आए हैं, जो माता-पिता के साथ पूरे समाज के लिए चिंता की बात हैं। पुलिस से मिली जानकारी के मुताबिक जनवरी से सितंबर 2026 के नौ महीनों में निंभोरा, रावेर और सावदा पुलिस स्टेशनों की हद से कुल 95 महिलाओं और लड़कियों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई।
इन 95 में 78 बालिग महिलाएं हैं और 17 नाबालिग लड़कियां। इनमें से 88 महिलाओं और लड़कियों का पता लगा लिया गया है और वे घर लौट आई हैं, जबकि सात मामले अब भी बाकी हैं।
सबसे ज्यादा फिक्र की बात नाबालिग लड़कियों की है। 17 नाबालिग लड़कियों के लापता होने की रिपोर्ट दर्ज हुई, जिनमें से 16 का पता लग चुका है। फिर भी नाबालिग लड़कियों के घर से चले जाने की घटनाओं को गंभीरता से लेने की जरूरत है। किशोर उम्र का भावनात्मक आकर्षण, प्रेम संबंध, मोबाइल और सोशल मीडिया का बढ़ता इस्तेमाल, माता-पिता से बातचीत की कमी और परिवार के भीतर दूरी जैसी वजहों पर समाज को ध्यान देना होगा।
अब पुलिस स्टेशन के हिसाब से देखें तो निंभोरा पुलिस स्टेशन की हद में नौ महीनों में 27 बालिग महिलाएं लापता हुईं, जिनमें से 24 का पता लग गया। यहां 5 नाबालिग लड़कियां भी लापता हुईं और पांचों वापस आ चुकी हैं। इस तरह निंभोरा में कुल 32 महिलाएं और लड़कियां लापता हुईं।
रावेर पुलिस स्टेशन की हद में 30 बालिग महिलाएं लापता हुईं, जिनमें से 29 लौट आई हैं। यहां 6 नाबालिग लड़कियां भी लापता हुईं और उनमें से 5 का पता लग चुका है। रावेर का कुल आंकड़ा 36 है। सावदा पुलिस स्टेशन की हद में 21 बालिग महिलाएं लापता हुईं, जिनमें से 19 वापस आ गईं। वहां 6 नाबालिग लड़कियां लापता थीं और छहों को ढूंढ लिया गया है। सावदा में कुल 27 महिलाएं और लड़कियां लापता हुईं।
इन मामलों की जांच में उपलब्ध जानकारी के मुताबिक ज्यादातर में प्रेम संबंध या प्रेम विवाह की पृष्ठभूमि सामने आ रही है। कुछ महिलाओं और लड़कियों ने परिवार को बताए बिना अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ जाने का फैसला किया, ऐसा भी पाया गया है। हालांकि हर लापता मामले के पीछे प्रेम संबंध या प्रेम विवाह ही वजह है, ऐसा सीधे तौर पर नहीं कहा जा सकता। हर मामले की अलग से जांच करके असल वजह सामने लाना जरूरी है।
ये सिर्फ पुलिस के रिकॉर्ड के आंकड़े हैं। बहुत से मामले पुलिस स्टेशन के बाहर ही सामाजिक सुलह से निपटा दिए जाते हैं और पुलिस में उनकी एंट्री नहीं होती, इसलिए असल संख्या इससे ज्यादा भी हो सकती है। यह आंकड़ा सिर्फ रिपोर्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलते सामाजिक हालात का एक गंभीर इशारा भी है।