मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

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23:50 IST

रात की शिफ्ट और कैंसर: रिसर्च में सीधा नहीं, अप्रत्यक्ष रिश्ता, सभी स्टडी एकमत नहीं

लंबे वक्त तक रात की शिफ्ट करने वालों में कैंसर के खतरे पर मेडिकल रिसर्च क्या कहती है, और WHO की IARC ने इसे किस श्रेणी में रखा है।

रात की शिफ्ट और कैंसर: रिसर्च में सीधा नहीं, अप्रत्यक्ष रिश्ता, सभी स्टडी एकमत नहीं तस्वीरें सत्यापित नहीं हैं

मेडिकल रिसर्च के मुताबिक लंबे समय तक नाइट शिफ्ट यानी रात की पाली में काम करने वालों और कैंसर के खतरे के बीच सीधा संबंध भले न हो, लेकिन अप्रत्यक्ष संबंध जरूर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के तहत आने वाली इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने रात की शिफ्ट के काम को 'Group 2A' श्रेणी में रखा है। इसका मतलब है Probably Carcinogenic to humans, यानी इंसानों के लिए कैंसर पैदा करने की संभावना वाला।

अस्पताल, कॉल सेंटर और दूसरे कई सेक्टरों में रात की पाली करने वाले कर्मचारियों की तादाद बड़ी है। रात भर जागना और दिन में सोना बहुत लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है। ऐसे में कई लोगों के मन में सवाल उठता है कि सालों तक नाइट शिफ्ट करने से सेहत पर असर पड़ता है या नहीं, और क्या इससे कैंसर का खतरा बढ़ सकता है।

इस मसले पर मेडिकल फील्ड में कई साल से रिसर्च चल रही है। रात की शिफ्ट करने वालों की नींद, शरीर के हार्मोन और नैचुरल बायोलॉजिकल साइकिल पर असर पड़ सकता है। इसी वजह से कुछ बीमारियों का खतरा बढ़ने की आशंका जताई जाती है। लेकिन नाइट शिफ्ट और कैंसर के रिश्ते पर सभी रिसर्च के नतीजे एक जैसे नहीं हैं। इस बारे में फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट के सर्जिकल ऑन्कोलॉजी विभाग के प्रिंसिपल डायरेक्टर डॉ. वेदांत काबरा ने अहम जानकारी दी है।

जानकारी के मुताबिक लंबे समय तक रात की शिफ्ट में काम करना कुछ किस्म के कैंसर के संभावित खतरों में से एक माना जाता है। फिर भी इस पर हुई बड़ी मेडिकल स्टडी में एक जैसे नतीजे सामने नहीं आए हैं। यानी लंबी नाइट शिफ्ट से कैंसर का खतरा बढ़ सकता है, मगर यह पक्का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि नाइट शिफ्ट करने से कैंसर होता ही है।

वैज्ञानिक वजहों में सबसे पहले IARC की श्रेणी का जिक्र आता है, जिसके तहत रात की शिफ्ट के काम को संभावित कैंसरजन्य माना गया है। दूसरी वजह बायोलॉजिकल घड़ी का बिगड़ना बताई गई है। रात को जागकर काम करने और दिन में सोने से शरीर की नैचुरल बायोलॉजिकल घड़ी बिगड़ जाती है। तीसरी वजह मेलाटोनिन हार्मोन की कमी है। रात के अंधेरे में 'मेलाटोनिन' नाम का हार्मोन बनता है, जो शरीर को कैंसर से बचाने में मदद करता है। रात में कृत्रिम रोशनी में काम करने से इस हार्मोन का बनना कम हो जाता है।

किस कैंसर का खतरा ज्यादा है, इस पर कुछ स्टडी में पाया गया है कि लंबे वक्त तक, मिसाल के तौर पर 20 साल या उससे ज्यादा, या नियमित नाइट शिफ्ट करने वाली महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा बढ़ा है। इसके अलावा स्किन और गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल यानी पाचन तंत्र के कैंसर का खतरा भी बढ़ा हुआ मिला है।

कैंसर के अलावा रात की शिफ्ट से कुछ और बीमारियों का खतरा भी बढ़ सकता है। इनमें नींद की कमी और स्लीप डिसऑर्डर, डायबिटीज, दिल की बीमारी और रोग प्रतिरोधक क्षमता में कमी शामिल हैं। उपाय के तौर पर रात की शिफ्ट के बाद या रोज 7 से 8 घंटे की पूरी और गहरी नींद, पौष्टिक खाना और सेहत की नियमित जांच का जिक्र किया गया है।

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