बुखार उतरने के बाद भी कम रहीं सफेद कोशिकाएं, जांच में निकला दुर्लभ ब्लड कैंसर APL
मुंबई में चालीस साल के एक आदमी को बुखार के बाद भी WBC काउंट कम रहने पर बोन मैरो जांच हुई। उसमें APL निकला और ATRA व आर्सेनिक से इलाज किया गया।
मुंबई में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें बुखार उतर जाने के बाद भी खून की रिपोर्ट में गड़बड़ी बनी रही। जांच हुई तो दुर्लभ ब्लड कैंसर APL निकला। बुखार आम बात है। दवा ली जाती है और आदमी ठीक हो जाता है। लेकिन कई बार बुखार जाने के बाद भी शरीर में कुछ गड़बड़ रह जाती है और पता नहीं चलता।
मामला चालीस साल के एक आदमी का है। उसे बुखार आया और बहुत कमजोरी महसूस हुई। वह डॉक्टर के पास गया, दवा ली और बुखार उतर भी गया। सबको लगा कि सब ठीक हो गया। पर खून की जांच हुई तो एक चीज लगातार खराब आ रही थी।
उसके खून में सफेद कोशिकाएं बहुत कम थीं। आम आदमी में ये 4000 से 11000 के बीच होती हैं, जबकि उसकी सिर्फ 2000 से 3000 थीं। बुखार ठीक होने के बाद भी ये कोशिकाएं बढ़ नहीं रही थीं।
शुरू में डॉक्टरों को भी लगा कि यह बुखार का असर होगा, क्योंकि बुखार के बाद अक्सर सफेद कोशिकाएं कम हो जाती हैं। मगर इस आदमी का मामला अलग था। उसका हिमोग्लोबिन ठीक था और प्लेटलेट्स भी ठीक थीं। सिर्फ सफेद कोशिकाएं कम थीं और किसी तरह बढ़ नहीं रही थीं।
तब वोकहार्ट हॉस्पिटल, मुंबई सेंट्रल के कैंसर विशेषज्ञ डॉ. प्रीतम कुमार जैन ने सोचा कि यह सिर्फ बुखार की वजह नहीं है, कुछ और है। उन्होंने बोन मैरो की जांच करने को कहा। बोन मैरो हड्डी के अंदर का वह हिस्सा है जहां खून बनता है।
बोन मैरो देखा गया तो उसमें बहुत सारी खराब और कच्ची कोशिकाएं दिखीं। इन्हें ब्लास्ट सेल्स कहते हैं। और गहराई से जांच हुई तो पता चला कि उस आदमी को Acute Promyelocytic Leukaemia यानी APL नाम का ब्लड कैंसर है। यह AML नाम के कैंसर का ही एक दुर्लभ प्रकार है।
डॉ. जैन ने कहा, "शुरू में कुछ खास नहीं लगा। बुखार जा चुका था, बाकी रिपोर्ट नॉर्मल थीं। पर सिर्फ सफेद कोशिकाएं कम ही रह रही थीं। हमें यही बात अहम लगी। हमने इसे नजरअंदाज नहीं किया और बोन मैरो की जांच की, इसीलिए बीमारी जल्दी पता चल गई।"
डॉ. जैन के मामले के मुताबिक इस कैंसर में सबसे बड़ा खतरा खून बहने या खून के थक्के जमने का होता है। इलाज में देर होती तो उसकी जान को खतरा था। लेकिन वक्त पर निदान हो गया। इस कैंसर का इलाज बाकी कैंसर से अलग होता है। इसमें कच्ची कोशिकाओं को पकाने के लिए दवाएं दी जाती हैं, जिससे वे कोशिकाएं अपने आप खत्म हो जाती हैं। उस आदमी का इलाज ATRA और आर्सेनिक नाम की दवाओं से शुरू किया गया।
वह करीब एक महीने अस्पताल में रहा। दवाओं का उसे अच्छा फायदा हुआ। शरीर की खराब कोशिकाएं पूरी तरह चली गईं और बीमारी काबू में आ गई। अच्छी बात यह रही कि पूरे इलाज में उसे खून चढ़ाने की जरूरत नहीं पड़ी।
डॉ. जैन ने कहा, "APL ऐसा कैंसर है जिसमें जल्दी निदान बहुत जरूरी है। हमने बड़ी गड़बड़ होने से पहले ही बीमारी पकड़ ली। इलाज का अच्छा असर हुआ। अब वह घर जा चुका है और रोज का काम कर रहा है। सिर्फ फॉलोअप के लिए आता है।"